सुनाम लेखा क्या है?
- (a)वैयक्तिक लेखा
- (b)वस्तुगत लेखा
- (c)आय-व्यय लेखा
- (d)व्यय लेखा
सही उत्तर — B, (b) वस्तुगत लेखा — ख्याति एक अमूर्त परिसंपत्ति है, और परंपरागत वर्गीकरण में हर परिसंपत्ति का खाता वास्तविक यानी वस्तुगत खाता होता है। सबसे पहले शब्दों को ठीक कर लीजिए, क्योंकि इस प्रश्न में असली कठिनाई हिन्दी शब्दावली की है, लेखांकन की नहीं। पुस्तिका 'सुनाम लेखा' लिखती है, जिसका अंग्रेज़ी स्तंभ में रूप Goodwill Account है — वही चीज़ जिसे वाणिज्य की हिन्दी पाठ्यपुस्तकें 'ख्याति खाता' कहती हैं। 'सुनाम' good-will का अक्षरशः अनुवाद है और वाणिज्य में प्रचलित नहीं है, इसलिए जिसने ख्याति पढ़ी है वह इसे पहचानने में ही समय गँवा सकता है। इसी तरह विकल्प (b) का 'वस्तुगत लेखा' Real Account है, जिसे पाठ्यपुस्तकें 'वास्तविक खाता' कहती हैं; साधारण हिन्दी में 'वस्तुगत' का अर्थ objective होता है और 'वैयक्तिक' का subjective, इसलिए विकल्प (a) और (b) पढ़कर मन दर्शनशास्त्र की उस जोड़ी की ओर चला जा सकता है, जिससे यहाँ कोई मतलब नहीं है। अब वर्गीकरण पर आइए। परंपरागत पद्धति में खाते तीन प्रकार के होते हैं। व्यक्तिगत खाते व्यक्तियों, फ़र्मों और संस्थाओं के होते हैं। वास्तविक खाते परिसंपत्तियों और संपत्तियों के होते हैं, और वे मूर्त भी हो सकते हैं — रोकड़, भवन, मशीनरी, स्टॉक — तथा अमूर्त भी — ख्याति, पेटेंट, व्यापार-चिह्न, प्रतिलिप्यधिकार। नाममात्र या आय-व्यय खाते व्यय, हानि, आय और लाभ के होते हैं। ख्याति दूसरे वर्ग में आती है क्योंकि वह एक अमूर्त परिसंपत्ति है — व्यवसाय की प्रतिष्ठा, स्थान, ग्राहक-संबंध और नाम का वह मूल्य जो उसे सामान्य से अधिक लाभ कमाने की क्षमता देता है। इसका सुनहरा नियम भी वही है जो हर वास्तविक खाते का है : जो आए उसे नाम कीजिए, जो जाए उसे जमा। एक निर्णायक जाँच याद रखिए : वास्तविक खाते वर्ष के अंत में बंद नहीं होते, उनका शेष तुलन-पत्र में आगे बढ़ जाता है; नाममात्र खाते लाभ-हानि खाते में स्थानांतरित होकर शून्य हो जाते हैं। ख्याति वर्ष-दर-वर्ष तुलन-पत्र में बनी रहती है, इसलिए वह नाममात्र खाता हो ही नहीं सकती।
- (a)वैयक्तिक लेखा — व्यक्तिगत खाते उन व्यक्तियों और निकायों के होते हैं जिनसे व्यवसाय का लेन-देन है, और उनके तीन रूप हैं : प्राकृतिक, जैसे राम का खाता; कृत्रिम, जैसे किसी कंपनी, बैंक या क्लब का खाता; और प्रातिनिधिक, जैसे बकाया वेतन, पूर्वदत्त किराया, पूँजी और आहरण, जो किसी व्यक्ति-समूह का प्रतिनिधित्व करते हैं। ख्याति इनमें से किसी में नहीं आती, क्योंकि वह किसी व्यक्ति के प्रति देय या लेय नहीं है। भ्रम की जड़ यह है कि ख्याति जन्म ही व्यक्तियों से लेती है — ग्राहकों के लौटकर आने से, कर्मचारियों की कुशलता से, आपूर्तिकर्ताओं के भरोसे से — इसलिए मन उसे 'व्यक्तियों से जुड़ी' मानकर व्यक्तिगत खाते में रख देता है। पर खाता उस संबंध का नहीं, उस संबंध से बनी परिसंपत्ति का है। इस विकल्प को हिन्दी शब्द और भी आकर्षक बना देता है, क्योंकि 'वैयक्तिक' और 'वस्तुगत' रोज़मर्रा की हिन्दी में subjective और objective की जोड़ी की तरह सुनाई देते हैं।
- (c)आय-व्यय लेखा — यह अंग्रेज़ी स्तंभ के Nominal Account यानी नाममात्र खाते के लिए छपा है, और यहीं इस प्रश्नपत्र की एक बड़ी शब्द-टकराहट बैठी है : हिन्दी में 'आय-व्यय लेखा' उस विवरण का भी नाम है जो अलाभकारी संस्थाएँ बनाती हैं — Income and Expenditure Account। इसलिए यह विकल्प पढ़कर पाठक एक बिलकुल दूसरी चीज़ की ओर चला जा सकता है। मूल बात यह है कि नाममात्र खाते व्यय, हानि, आय और लाभ के होते हैं — वेतन, किराया, कमीशन, बट्टा — और उनका सुनहरा नियम है : समस्त व्यय और हानियाँ नाम, समस्त आय और लाभ जमा। इनकी सबसे बड़ी पहचान यह है कि वर्ष के अंत में ये लाभ-हानि खाते में स्थानांतरित होकर बंद हो जाते हैं और तुलन-पत्र में इनका कोई शेष नहीं जाता। ख्याति के साथ ठीक उल्टा होता है — वह तुलन-पत्र की परिसंपत्ति की ओर वर्ष-दर-वर्ष टिकी रहती है। इसलिए यह विकल्प उत्तर नहीं बनता।
- (d)व्यय लेखा — इस विकल्प में दो अलग-अलग कमियाँ हैं और दोनों जान लेना उपयोगी है। पहली, वर्गीकरण की : परंपरागत पद्धति में 'व्यय खाता' नाम की कोई अलग श्रेणी है ही नहीं — व्यय के खाते नाममात्र खातों के ही भीतर आते हैं, इसलिए यह विकल्प तीन-भागी वर्गीकरण के बाहर की चीज़ माँग रहा है। यह श्रेणी आधुनिक या अमेरिकी वर्गीकरण में मिलती है, जहाँ खाते परिसंपत्ति, देयता, पूँजी, आय और व्यय — इन पाँच वर्गों में बाँटे जाते हैं; पर उस पद्धति में भी ख्याति व्यय नहीं, परिसंपत्ति ही कहलाएगी। दूसरी कमी लेखांकन उपचार की है : क्रय की गई ख्याति को व्यय मानकर बट्टे-खाते नहीं डाला जाता, उसे परिसंपत्ति के रूप में पूँजीकृत किया जाता है। और यह भी याद रखिए कि स्वतः अर्जित ख्याति बहियों में दर्ज ही नहीं की जाती — केवल वही ख्याति आती है जिसके लिए मूल्य चुकाया गया हो। इसलिए ख्याति न तो व्यय है, न व्यय-खाता।
खातों का परंपरागत वर्गीकरण तीन वर्गों का है और हर वर्ग का अपना सुनहरा नियम है। व्यक्तिगत खाते — प्राप्तकर्ता को नाम, देने वाले को जमा। वास्तविक यानी वस्तुगत खाते — जो आए उसे नाम, जो जाए उसे जमा। नाममात्र खाते — समस्त व्यय और हानियाँ नाम, समस्त आय और लाभ जमा। वास्तविक खाते फिर मूर्त और अमूर्त में बँटते हैं : मूर्त वे जिन्हें छुआ जा सके, जैसे रोकड़, फ़र्नीचर, भवन, मशीनरी, स्टॉक; अमूर्त वे जिनका भौतिक अस्तित्व नहीं पर आर्थिक मूल्य है, जैसे ख्याति, पेटेंट, व्यापार-चिह्न, प्रतिलिप्यधिकार और लाइसेंस। ख्याति इसी दूसरी उपश्रेणी की सबसे अधिक पूछी जाने वाली मद है। ख्याति क्या है, यह भी स्पष्ट रखिए : वह व्यवसाय की उस प्रतिष्ठा और स्थिति का मूल्य है जो उसे उद्योग के सामान्य प्रतिफल से अधिक लाभ कमाने योग्य बनाती है — अच्छी अवस्थिति, पुराना नाम, वफ़ादार ग्राहक, कुशल प्रबंधन, एकाधिकार जैसी सुविधाएँ। यही कारण है कि उसका मूल्यांकन प्रायः औसत लाभ, अधिलाभ, पूँजीकरण या वार्षिकी विधियों से किया जाता है, और वह प्रायः साझेदार के प्रवेश, अवकाश-ग्रहण या मृत्यु के समय, तथा व्यवसाय के क्रय-विक्रय के समय सामने आती है।
एक व्यावहारिक और परीक्षा-उपयोगी नियम यहीं जोड़ लीजिए : बहियों में केवल क्रीत ख्याति आती है, स्वतः अर्जित ख्याति नहीं। इसका कारण विवेकशीलता और मापन की विश्वसनीयता दोनों हैं — अपनी ही प्रतिष्ठा का मूल्य लगाकर उसे परिसंपत्ति दिखा देना लाभ और परिसंपत्ति दोनों को बढ़ा-चढ़ाकर दिखाना होगा। यही बात अमूर्त परिसंपत्तियों के लेखांकन मानक में भी दर्ज है। यह भी ध्यान रखिए कि ख्याति का तुलन-पत्र में टिका रहना चालू व्यवसाय की मान्यता पर निर्भर है : यदि व्यवसाय बंद होने वाला हो तो परिसंपत्तियों का मूल्य वसूली-योग्य आधार पर देखा जाएगा और ख्याति प्रायः सबसे पहले ढह जाती है। इसी प्रश्नपत्र में चालू व्यवसाय की मान्यता पर अलग प्रश्न है, और उसे इस प्रश्न के साथ पढ़ना दोनों को मज़बूत करता है। अंत में एक भाषा-टिप्पणी : हिन्दी स्तंभ यहाँ पूरा प्रश्न-वाक्य बनाकर प्रश्नचिह्न के साथ छापता है — 'सुनाम लेखा क्या है?' — जबकि अंग्रेज़ी स्तंभ अधूरा वाक्य छोड़ता है जिसे विकल्प पूरा करते हैं। अर्थ वही रहता है।
- परंपरागत वर्गीकरण में खाते तीन प्रकार के हैं — व्यक्तिगत, वास्तविक (वस्तुगत) और नाममात्र।
- वास्तविक खाते परिसंपत्तियों के होते हैं और मूर्त (रोकड़, भवन, मशीनरी, स्टॉक) तथा अमूर्त (ख्याति, पेटेंट, व्यापार-चिह्न, प्रतिलिप्यधिकार) दोनों हो सकते हैं।
- ख्याति एक अमूर्त परिसंपत्ति है, इसलिए ख्याति खाता वास्तविक खाता है और उसका नियम है — जो आए उसे नाम, जो जाए उसे जमा।
- निर्णायक जाँच : वास्तविक खाते वर्ष के अंत में बंद नहीं होते और उनका शेष तुलन-पत्र में जाता है, जबकि नाममात्र खाते लाभ-हानि खाते में स्थानांतरित होकर शून्य हो जाते हैं।
- बहियों में केवल क्रीत ख्याति दर्ज होती है; स्वतः अर्जित ख्याति दर्ज नहीं की जाती।
- आधुनिक या अमेरिकी वर्गीकरण में खाते पाँच वर्गों में बँटते हैं — परिसंपत्ति, देयता, पूँजी, आय और व्यय — और वहाँ भी ख्याति परिसंपत्ति ही है, व्यय नहीं।
- शब्दावली की टकराहटें : 'सुनाम लेखा' Goodwill Account है, जिसे पाठ्यपुस्तकें ख्याति खाता कहती हैं; 'वस्तुगत लेखा' Real Account है, जिसे वास्तविक खाता कहा जाता है; और 'आय-व्यय लेखा' यहाँ Nominal Account के लिए है, जबकि हिन्दी में वही नाम अलाभकारी संस्था के Income and Expenditure Account का भी है।
- ख्याति मूल्यांकन की सामान्य विधियाँ : औसत लाभ, अधिलाभ, पूँजीकरण और वार्षिकी।
- 'सुनाम लेखा' को कोई नया या अलग खाता समझ लेना; वह Goodwill Account यानी ख्याति खाता ही है।
- 'वैयक्तिक' और 'वस्तुगत' को subjective और objective की जोड़ी मान लेना; यहाँ वे Personal और Real Account हैं।
- ख्याति को व्यक्तिगत खाता मान लेना क्योंकि वह ग्राहकों और प्रतिष्ठा से बनती है; खाता उस संबंध का नहीं, उससे बनी परिसंपत्ति का है।
- 'आय-व्यय लेखा' पढ़कर अलाभकारी संस्था वाले Income and Expenditure Account की ओर चले जाना; यहाँ वह Nominal Account के लिए छपा है।
- स्वतः अर्जित ख्याति को भी बहियों में दिखाने योग्य मान लेना; केवल क्रीत ख्याति दर्ज होती है।
इस विषय से प्रश्न चार ढंग से आते हैं। पहला यही — कोई मद देकर पूछना कि वह किस प्रकार का खाता है, जहाँ ख्याति, पेटेंट, पूँजी, आहरण, बकाया वेतन और बट्टा सबसे अधिक लौटते हैं; इनमें सबसे कठिन प्रातिनिधिक खाते होते हैं, क्योंकि वे दिखते व्यय जैसे हैं और होते व्यक्तिगत। दूसरा नियम पूछने का है : किसी खाते के सामने उसका सुनहरा नियम माँगना, या कोई लेन-देन देकर नाम-जमा तय करवाना। तीसरा वर्गीकरण के अंदर का है : मूर्त और अमूर्त परिसंपत्ति में भेद, या यह पूछना कि दी गई सूची में कौन-सी मद अमूर्त परिसंपत्ति नहीं है। चौथा ख्याति-विशिष्ट है : उसका अर्थ, प्रकार, मूल्यांकन विधियाँ और साझेदारी में उसका समायोजन। इन सबके लिए सबसे अच्छा अभ्यास यह है कि पच्चीस-तीस मदों की एक सूची बनाकर हर मद के सामने दो बातें लिख लीजिए — खाते का प्रकार और उसका नियम।
इस प्रश्न से सीधे संबंधित कोई पूर्व PYQ उपलब्ध नहीं।
- practice — not a real PYQ
निम्नलिखित में से कौन-सा खाता वास्तविक (वस्तुगत) खाता नहीं है?
- (a)ख्याति खाता
- (b)पेटेंट खाता
- (c)मशीनरी खाता
- (d)वेतन खाता
उत्तर(d) वेतन खाता
- practice — not a real PYQ
वास्तविक (वस्तुगत) खाते का सुनहरा नियम कौन-सा है?
- (a)प्राप्तकर्ता को नाम, देने वाले को जमा
- (b)जो आए उसे नाम, जो जाए उसे जमा
- (c)समस्त व्यय और हानियाँ नाम, समस्त आय और लाभ जमा
- (d)बढ़ने वाली देयता को नाम, घटने वाली देयता को जमा
उत्तर(b) जो आए उसे नाम, जो जाए उसे जमा