निम्नलिखित में से किस मजदूरी का, विधान या आर्थिक संगठन के माध्यम से प्रयास कर, भुगतान करने के लिए भारत के संविधान का अनुच्छेद 43 राज्य को आदेश देता है?
- (a)निर्वाह मजदूरी
- (b)न्यूनतम मजदूरी
- (c)उचित मजदूरी
- (d)आवश्यकता-आधारित न्यूनतम मजदूरी
सही उत्तर — A, (a) निर्वाह मजदूरी — संविधान का अनुच्छेद 43 जिस मजदूरी का नाम लेकर उसे सुलभ कराने का प्रयास राज्य पर डालता है, वह यही है। अनुच्छेद 43 का पाठ ही इस प्रश्न को हल कर देता है : राज्य, उपयुक्त विधान या आर्थिक संगठन द्वारा या किसी अन्य रीति से कृषि के, उद्योग के या अन्य प्रकार के सभी कर्मकारों को काम, निर्वाह मजदूरी, शिष्ट जीवनस्तर और अवकाश का संपूर्ण उपभोग सुनिश्चित करने वाली काम की दशाएँ तथा सामाजिक और सांस्कृतिक अवसर प्राप्त कराने का प्रयास करेगा; और विशिष्टतया ग्रामों में कुटीर उद्योगों को वैयक्तिक या सहकारी आधार पर बढ़ाने का प्रयास करेगा। ध्यान दीजिए कि स्टेम का 'विधान या आर्थिक संगठन के माध्यम से प्रयास कर' वाला वाक्यांश इसी अनुच्छेद से उठाया गया है — प्रश्न स्वयं आपको अपना पता दे रहा है। अब एक शब्द पर ठहरिए, क्योंकि यहीं इस प्रश्न का असली ख़तरा है। अंग्रेज़ी स्तंभ में विकल्प (a) 'Living wage' है और हिन्दी स्तंभ उसे 'निर्वाह मजदूरी' छापता है। साधारण हिन्दी में 'निर्वाह' सुनकर मन 'गुज़ारे भर की मजदूरी' की ओर चला जाता है, अर्थात् subsistence wage की ओर, जो मजदूरी-सीढ़ी का सबसे नीचे का पायदान है — केवल शारीरिक जीवन-रक्षा भर। संविधान यहाँ ठीक उल्टा अर्थ माँग रहा है : निर्वाह मजदूरी इस सीढ़ी का सबसे ऊपर का पायदान है। यह आयोग की गढ़ी हुई शब्दावली भी नहीं है — संविधान के हिन्दी पाठ में यही शब्द छपा है और अनुच्छेद 43 का शीर्षक ही 'कर्मकारों के लिए निर्वाह मजदूरी आदि' है। इसलिए इस शब्द से लड़िए मत, इसे संविधान की अपनी संज्ञा मानकर याद कर लीजिए। सीढ़ी को इसी क्रम में रखिए : न्यूनतम मजदूरी, फिर उचित मजदूरी, फिर निर्वाह मजदूरी। तीनों में से संविधान केवल सबसे ऊपर वाली का नाम लेता है, और वही यहाँ चाहा गया है।
- (b)न्यूनतम मजदूरी — न्यूनतम मजदूरी संविधान की नहीं, विधि की देन है। उसे अनुच्छेद 43 नहीं, बल्कि न्यूनतम मजदूरी अधिनियम, 1948 — और अब उसे समाहित करने वाली मजदूरी संहिता, 2019 — निर्धारित करती है, जहाँ समुचित सरकार अनुसूचित नियोजनों के लिए दरें तय करती है और केंद्र एक फ़्लोर वेज (आधार मजदूरी) तय करता है जिससे नीचे कोई दर नहीं जा सकती। उचित मजदूरी समिति (1948) की सीढ़ी पर यह सबसे नीचे की, बाध्यकारी मंज़िल है : इतना कि श्रमिक और उसके परिवार का भरण-पोषण हो और श्रमिक की कार्यक्षमता भी बनी रहे। अनुच्छेद 43 इससे कहीं ऊँची बात कहता है — शिष्ट जीवनस्तर, अवकाश का संपूर्ण उपभोग, सामाजिक और सांस्कृतिक अवसर — और वह न्यूनतम मजदूरी की परिभाषा में नहीं समाता। यह विकल्प इसलिए भी आकर्षक लगता है कि इसी प्रश्नपत्र में न्यूनतम मजदूरी अधिनियम, 1948 पर एक और प्रश्न है, इसलिए वह शब्द स्मृति में ताज़ा रहता है।
- (c)उचित मजदूरी — उचित मजदूरी (fair wage) सीढ़ी का बीच का पायदान है — न्यूनतम से ऊपर, निर्वाह से नीचे। उचित मजदूरी समिति (Committee on Fair Wages), 1948 ने इसी तीन-स्तरीय वर्गीकरण को गढ़ा और उचित मजदूरी को उद्योग की भुगतान-क्षमता से जोड़ा : उत्पादकता, प्रचलित मजदूरी दरें, राष्ट्रीय आय का स्तर और अर्थव्यवस्था में उस उद्योग का स्थान देखकर वह तय होती है। यानी यह वह मजदूरी है जो उद्योग दे सके, न कि वह जो श्रमिक को शिष्ट जीवन दे सके। अनुच्छेद 43 का लक्ष्य दूसरा है और उसका शब्द भी दूसरा है। इस विकल्प का काम यहाँ यही है कि जिस अभ्यर्थी ने सीढ़ी के तीनों नाम पढ़े हों पर यह न याद रखा हो कि संविधान किसका नाम लेता है, वह बीच वाला चुन बैठे।
- (d)आवश्यकता-आधारित न्यूनतम मजदूरी — आवश्यकता-आधारित न्यूनतम मजदूरी (need-based minimum wage) संविधान का नहीं, 15वें भारतीय श्रम सम्मेलन (1957) का पद है। वहाँ न्यूनतम मजदूरी की गणना के लिए मानक तय किए गए थे — एक कमाने वाले के लिए तीन उपभोग इकाइयाँ, प्रति वयस्क लगभग 2,700 कैलोरी का आहार, प्रति परिवार प्रति वर्ष 72 गज कपड़ा, सरकारी औद्योगिक आवास योजना के न्यूनतम क्षेत्र के अनुसार किराया, तथा ईंधन-प्रकाश-विविध के लिए कुल का लगभग 20 प्रतिशत। बाद में उच्चतम न्यायालय ने रैप्टाकोस ब्रेट वाले निर्णय में बच्चों की शिक्षा, चिकित्सा, मनोरंजन तथा वृद्धावस्था और विवाह के प्रावधान का एक और मद जोड़ा। ध्यान दीजिए कि यह सब न्यूनतम मजदूरी को समृद्ध करता है, उसे निर्वाह मजदूरी नहीं बना देता — यह वही पायदान है जो ऊपर उठाया गया है, ऊपर वाला पायदान नहीं। अनुच्छेद 43 में यह पद कहीं नहीं आता।
इस प्रश्न की जड़ में दो चीज़ें हैं — राज्य के नीति निदेशक तत्त्वों में अनुच्छेद 43 का स्थान, और भारत की मजदूरी-सीढ़ी। अनुच्छेद 43 संविधान के भाग IV में है, इसलिए अनुच्छेद 37 के अनुसार वह न्यायालय द्वारा प्रवर्तनीय नहीं है, फिर भी देश के शासन में मूलभूत है और विधि बनाते समय राज्य का कर्तव्य है कि इन तत्त्वों को लागू करे। इसकी भाषा 'प्रयास करेगा' है, 'सुनिश्चित करेगा' नहीं — यही निदेशक तत्त्वों की पहचान है। मजदूरी-सीढ़ी उचित मजदूरी समिति (1948) की देन है और उसके तीन पायदान हैं। न्यूनतम मजदूरी सबसे नीचे : भरण-पोषण और कार्यक्षमता की रक्षा भर। उचित मजदूरी बीच में : उद्योग की भुगतान-क्षमता से बँधी हुई। निर्वाह मजदूरी सबसे ऊपर : श्रमिक और उसके परिवार को शिष्ट जीवन-स्तर, अवकाश, तथा सामाजिक और सांस्कृतिक अवसर देने वाली। इसी सबसे ऊपर वाले पायदान का नाम अनुच्छेद 43 लेता है, और इसी कारण उसे एक लक्ष्य कहा जाता है, एक तत्काल बाध्यता नहीं।
श्रम से जुड़े संवैधानिक अनुच्छेदों को एक साथ पढ़ना इस प्रश्नपत्र के लिए सबसे उपयोगी अभ्यास है, क्योंकि यह प्रश्नपत्र उन्हें बार-बार छूता है। अनुच्छेद 39(d) समान कार्य के लिए समान वेतन कहता है; अनुच्छेद 41 काम, शिक्षा और कुछ दशाओं में लोक सहायता का उपबंध करता है; अनुच्छेद 42 काम की न्यायसंगत और मानवोचित दशाओं तथा प्रसूति सहायता की बात करता है; अनुच्छेद 43 निर्वाह मजदूरी और कुटीर उद्योगों की; अनुच्छेद 43क (42वाँ संशोधन, 1976) उद्योगों के प्रबंध में कर्मकारों की भागीदारी की; और अनुच्छेद 43ख (97वाँ संशोधन, 2011) सहकारी समितियों को बढ़ावा देने की। इनके साथ मूल अधिकारों की ओर से अनुच्छेद 23 (बलात् श्रम का प्रतिषेध) और अनुच्छेद 24 (कारख़ानों-खानों में बाल-नियोजन का प्रतिषेध) जुड़ते हैं, और इसी प्रश्नपत्र में अनुच्छेद 24 पर अलग से प्रश्न पूछा गया है। विधायी पक्ष पर आज मजदूरी संहिता, 2019 चार पुराने अधिनियमों को — न्यूनतम मजदूरी अधिनियम 1948, मजदूरी संदाय अधिनियम 1936, बोनस संदाय अधिनियम 1965 और समान पारिश्रमिक अधिनियम 1976 — एक जगह लाती है, और उसमें फ़्लोर वेज की संकल्पना पहली बार वैधानिक रूप लेती है। निर्वाह मजदूरी अब भी लक्ष्य ही है; भारत ने अपनी वैधानिक मजदूरी-नीति को अभी न्यूनतम से आगे बढ़ाकर उस स्तर तक नहीं पहुँचाया है।
- अनुच्छेद 43 राज्य से यह प्रयास कराता है कि उपयुक्त विधान या आर्थिक संगठन द्वारा या किसी अन्य रीति से सभी कर्मकारों को काम, निर्वाह मजदूरी (living wage), शिष्ट जीवनस्तर सुनिश्चित करने वाली काम की दशाएँ तथा सामाजिक और सांस्कृतिक अवसर मिलें।
- अनुच्छेद 43 का दूसरा भाग ग्रामों में कुटीर उद्योगों को वैयक्तिक या सहकारी आधार पर बढ़ाने की बात करता है — यही उसे गांधीवादी निदेशक तत्त्वों में गिनाता है।
- संविधान के हिन्दी पाठ में 'living wage' का शब्द 'निर्वाह मजदूरी' ही है, और अनुच्छेद 43 का शीर्षक 'कर्मकारों के लिए निर्वाह मजदूरी आदि' है — यह पुस्तिका की अपनी गढ़ी हुई शब्दावली नहीं है।
- उचित मजदूरी समिति (1948) की सीढ़ी नीचे से ऊपर इस क्रम में है : न्यूनतम मजदूरी, उचित मजदूरी, निर्वाह मजदूरी।
- आवश्यकता-आधारित न्यूनतम मजदूरी 15वें भारतीय श्रम सम्मेलन (1957) के मानकों से आती है — तीन उपभोग इकाइयाँ, लगभग 2,700 कैलोरी, प्रति परिवार प्रति वर्ष 72 गज कपड़ा, आवास किराया, तथा ईंधन-प्रकाश-विविध के लिए लगभग 20 प्रतिशत।
- अनुच्छेद 43 भाग IV में है, इसलिए अनुच्छेद 37 के अनुसार न्यायालय द्वारा प्रवर्तनीय नहीं है, पर देश के शासन में मूलभूत है।
- अनुच्छेद 43क कर्मकारों की प्रबंध में भागीदारी 42वें संशोधन (1976) से आई; अनुच्छेद 43ख सहकारी समितियों पर 97वें संशोधन (2011) से।
- 'निर्वाह मजदूरी' को subsistence wage समझ बैठना; साधारण हिन्दी में 'निर्वाह' गुज़ारे भर का अर्थ देता है, पर संविधान में यही शब्द living wage के लिए है और वह सीढ़ी का सबसे ऊपर का पायदान है।
- अनुच्छेद 43 और अनुच्छेद 43क को मिला देना; 43 निर्वाह मजदूरी और कुटीर उद्योग की बात करता है, 43क प्रबंध में कर्मकारों की भागीदारी की।
- न्यूनतम मजदूरी को संविधान में खोजना; वह विधि से आती है, अनुच्छेद 43 से नहीं।
- आवश्यकता-आधारित न्यूनतम मजदूरी को निर्वाह मजदूरी का पर्याय मान लेना; वह न्यूनतम मजदूरी का ही एक परिष्कृत रूप है और 1957 के श्रम सम्मेलन से आता है।
- अनुच्छेद 42 और 43 का घालमेल; 42 काम की न्यायसंगत और मानवोचित दशाओं तथा प्रसूति सहायता का अनुच्छेद है।
इस अनुच्छेद से प्रश्न तीन ढंग से आते हैं। पहला ढंग यही है — अनुच्छेद का नंबर देकर उसमें छपा हुआ पद पुछवाना, और विकल्पों में मजदूरी-सीढ़ी के सारे नाम एक साथ रख देना; यहाँ बचाव का एक ही तरीका है, कि अनुच्छेद का असली वाक्य याद हो, केवल विषय नहीं। दूसरा ढंग उल्टा है — पद देकर अनुच्छेद पुछवाना, जैसे 'कर्मकारों की प्रबंध में भागीदारी किस अनुच्छेद में है', जहाँ 43 और 43क के बीच चुनाव करना पड़ता है। तीसरा ढंग कथन-आधारित है : दो कथन देकर पूछना कि निदेशक तत्त्व न्यायालय द्वारा प्रवर्तनीय हैं या नहीं, या कि अनुच्छेद 43 किस श्रेणी के निदेशक तत्त्व में आता है। तैयारी का सबसे किफ़ायती तरीका यह है कि श्रम वाले सात-आठ अनुच्छेदों की एक छोटी सूची बनाकर हर अनुच्छेद के सामने उसका एक निर्णायक शब्द लिख लीजिए — 23 बलात् श्रम, 24 बाल-नियोजन, 39(d) समान वेतन, 41 काम का अधिकार, 42 प्रसूति सहायता, 43 निर्वाह मजदूरी, 43क भागीदारी, 43ख सहकारिता।
इस प्रश्न से सीधे संबंधित कोई पूर्व PYQ उपलब्ध नहीं।
- practice — not a real PYQ
भारत के संविधान का कौन-सा अनुच्छेद उद्योगों के प्रबंध में कर्मकारों की भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए राज्य से कदम उठाने को कहता है?
- (a)अनुच्छेद 42
- (b)अनुच्छेद 43
- (c)अनुच्छेद 43क
- (d)अनुच्छेद 43ख
उत्तर(c) अनुच्छेद 43क
- practice — not a real PYQ
न्यूनतम मजदूरी, उचित मजदूरी और निर्वाह मजदूरी का तीन-स्तरीय वर्गीकरण किसने दिया था?
- (a)उचित मजदूरी समिति, 1948
- (b)15वाँ भारतीय श्रम सम्मेलन, 1957
- (c)प्रथम राष्ट्रीय श्रम आयोग, 1969
- (d)द्वितीय राष्ट्रीय श्रम आयोग, 2002
उत्तर(a) उचित मजदूरी समिति, 1948