निम्नलिखित में से कानूनी रूप से निर्धारित अधिकतम आकार जिसके आगे कोई भी किसान कोई भूमि नहीं रख सकता है ?
- (a)बिचौलियों का उन्मूलन
- (b)काश्तकारी सुधार
- (c)भूमि सीमा
- (d)भूमि समेकन
सही — (c) भूमि सीमा। प्रश्न में जो कहा गया है वह भूमि सीमा (सीलिंग) की पाठ्यपुस्तकीय परिभाषा है, शब्दशः: कृषि भूमि के उस क्षेत्रफल की वैधानिक ऊपरी हद जो कोई व्यक्ति या परिवार रख सकता है, और उससे ऊपर जो कुछ है वह अधिशेष घोषित होकर राज्य में निहित होता है और भूमिहीनों तथा सीमांत कृषकों में पुनर्वितरित किया जाता है। स्वतंत्रता के बाद भारत के भूमि सुधार के चार स्तंभों में यह तीसरा है, और चारों में अकेला ऐसा है जो कोई *मात्रा* तय करता है। इस प्रश्न का पूरा भेद यही है — बाकी तीनों विकल्प मनुष्यों और भूमि के बीच के *संबंध* में बदलाव बताते हैं, यह नहीं बताते कि एक परिवार कितनी भूमि रख सकता है। चूँकि भूमि राज्य सूची की प्रविष्टि 18 के अंतर्गत राज्य का विषय है, इसलिए कोई एक राष्ट्रीय सीमा है ही नहीं: हर राज्य ने अपना सीलिंग अधिनियम पारित किया, अधिकतर 1960 और 1970 के दशकों में, और हर एक ने भूमि की गुणवत्ता के अनुसार श्रेणीबद्ध अपनी सीमाएँ तय कीं, इसलिए सिंचित दो-फ़सली जोत पर सीमा शुष्क असिंचित भूमि की तुलना में कहीं कम होती है। सीलिंग के क़ानून भूमि सुधार का सबसे अधिक मुक़दमेबाज़ी वाला हिस्सा भी रहे। संसद को संविधान (पहला संशोधन) अधिनियम, 1951 से अनुच्छेद 31क और 31ख इसीलिए जोड़ने पड़े थे कि राज्य विधानमंडलों के पारित कृषि सुधार उपाय 'विलंबकारी मुक़दमेबाज़ी' में अटकाए जा रहे थे; उसी संशोधन ने ज़मींदारी उन्मूलन के तेरह अधिनियमों को भूतलक्षी प्रभाव से वैध ठहराया। एक दशक बाद सीलिंग को भी वही प्रतिरोध मिला, और बिहार में जितनी अधिशेष भूमि वास्तव में बाँटी गई वह अधिनियमों के वादे से बहुत कम रही।
- (a)बिचौलियों का उन्मूलन — भूमि सुधार का पहला स्तंभ और सबसे पहले आने वाला — इसने ज़मींदारों, जागीरदारों तथा लगान वसूलने वाले अन्य बिचौलियों को हटाया, जो राज्य और जोतने वाले के बीच खड़े थे, और कृषक को सीधे सरकार के संपर्क में ला दिया। यह बदलता है कि किसान किसे भुगतान करे, यह नहीं कि कौन कितनी भूमि रख सकता है। बिहार का अपना ज़मींदारी उन्मूलन क़ानून इसी श्रेणी में आता है, और 1951 का पहला संशोधन इसी उपाय की रक्षा के लिए लिखा गया था।
- (b)काश्तकारी सुधार — दूसरा स्तंभ: काश्तकार जो लगान देता है उसका नियमन, जोत की सुरक्षा ताकि काश्तकार को मनमाने ढंग से न हटाया जा सके, और कई राज्यों में काश्तकार को उस भूमि का स्वामित्व देना जिसे वह जोतता है। यह उन शर्तों को नियंत्रित करता है जिन पर भूमि पट्टे पर दी और जोती जाती है। इन क़ानूनों से सुरक्षित हुआ काश्तकार तब भी बहुत छोटे टुकड़े पर खेती कर रहा हो सकता है, और भू-स्वामी पर इनसे कोई ऊपरी हद लगती ही नहीं।
- (d)भूमि समेकन — चौथा स्तंभ, चकबंदी — किसान के बिखरे हुए टुकड़ों को एक सघन खंड में मिला देना, ताकि सिंचाई, मशीनीकरण और मेड़ों का रख-रखाव किफ़ायती हो जाए। यह जोत का आकार-प्रकार और स्थान बदलता है जबकि उसका कुल क्षेत्रफल ठीक जितना था उतना ही रहने देता है — यानी सीलिंग जो करती है उसका बिल्कुल उल्टा।
1947 के बाद भारत के भूमि सुधार कार्यक्रम के चार अलग-अलग अंग थे, और इस प्रकार के प्रश्न यही परखते हैं कि आप उन्हें अलग-अलग रख पाते हैं या नहीं। पहला, बिचौलियों का उन्मूलन — ज़मींदारों और जागीरदारों को हटाना ताकि कृषक का सीधा वास्ता राज्य से हो। दूसरा, काश्तकारी सुधार — उचित लगान तय करना, जोत की सुरक्षा देना और कहीं-कहीं काश्तकार को स्वामित्व दे देना। तीसरा, जोत पर सीमा — एक वैधानिक अधिकतम, जिसके ऊपर का अधिशेष पुनर्वितरण के लिए अर्जित किया जाए। चौथा, जोतों का समेकन — बिखरे हुए टुकड़ों को फिर से जोड़कर सघन खंड बनाना। पहले दो क़ानून की दृष्टि से ठीक-ठाक सफल रहे, भले व्यवहार में हमेशा नहीं; तीसरा पूरे भारत में सबसे कम सफल रहा, क्योंकि सीमाएँ ऊँची रखी गईं, छूटें बहुत थीं, और भू-स्वामियों ने नाते-रिश्तेदारों, न्यासों और बेनामी धारकों के बीच स्वामित्व को उससे तेज़ी से पुनर्गठित कर लिया जितनी तेज़ी से राजस्व तंत्र उसे नाप सकता था। वैधानिक रास्ते के साथ-साथ स्वैच्छिक रास्ता भी चला: विनोबा भावे ने भूदान आंदोलन 18 अप्रैल 1951 को पोचमपल्ली में शुरू किया, जब एक भू-स्वामी ने भूमिहीनों के लिए 100 एकड़ दे दी, और बिहार उसके सबसे बड़े रंगमंचों में से एक बना।
प्रश्न को इस दृष्टि से पढ़िए कि वह किस संज्ञा की परिभाषा दे रहा है, न कि यह कि वह किस विषय का है। यहाँ हर विकल्प भूमि सुधार का असली पारिभाषिक शब्द है, इसलिए 'भूमि सुधार' से दायरा तनिक भी नहीं घटता; दायरा इससे घटता है कि प्रश्न एक *अधिकतम आकार* का वर्णन कर रहा है — कितने एकड़ या हेक्टेयर। चारों में केवल एक ही मात्रा का नियम है। हर एक को परखिए: बिचौलियों का उन्मूलन शृंखला से एक व्यक्ति हटाता है; काश्तकारी सुधार एक अनुबंध फिर से लिखता है; समेकन मानचित्र पर खेतों को फिर से जमाता है। इनमें से कोई किसी मात्रा की बात करता ही नहीं। सीमा और कुछ करती ही नहीं। यही जाँच उल्टी दिशा में भी चलती है और अभ्यास योग्य है, क्योंकि BPSC इस समूह पर लौटता रहता है: यदि प्रश्न कहे 'बिखरे टुकड़े एक खंड में मिलाना' तो उत्तर समेकन है, यदि कहे 'जोत की सुरक्षा' तो काश्तकारी सुधार, और यदि कहे 'ज़मींदार हटाए गए' तो बिचौलियों का उन्मूलन। एक और सावधानी — सीमा की हदें पूरे भारत में एक जैसी नहीं हैं, क्योंकि भूमि राज्य का विषय है, इसलिए किसी एक एकड़-संख्या को *भारत की* सीमा कहकर उद्धृत नहीं किया जा सकता।
- भूमि सीमा यह तय करती है कि कोई व्यक्ति या परिवार अधिकतम कितना कृषि क्षेत्र रख सकता है; उससे अधिक को अधिशेष घोषित कर राज्य में निहित किया जाता है और मुख्यतः भूमिहीनों तथा सीमांत कृषकों में बाँटा जाता है।
- भूमि राज्य सूची की प्रविष्टि 18 के अंतर्गत राज्य का विषय है, इसलिए हर सीलिंग क़ानून राज्य का अधिनियम है और उसकी अपनी सीमाएँ हैं, जो सिंचाई और फ़सल-सघनता के अनुसार श्रेणीबद्ध होती हैं — शुष्क भूमि पर सीमा सिंचित दो-फ़सली भूमि से कहीं अधिक होती है।
- संविधान (पहला संशोधन) अधिनियम, 1951 ने अनुच्छेद 31क और 31ख इसलिए जोड़े कि कृषि सुधार के उपाय 'विलंबकारी मुक़दमेबाज़ी' में अटकाए जा रहे थे, और उसने ज़मींदारी उन्मूलन के तेरह अधिनियमों को भूतलक्षी प्रभाव से वैध ठहराया।
- भूमि सुधार के चार अंग हैं बिचौलियों का उन्मूलन, काश्तकारी सुधार, जोत पर सीमा और जोतों का समेकन — इनमें केवल तीसरा जोत के आकार पर ऊपरी हद लगाता है।
- भूदान आंदोलन 18 अप्रैल 1951 को पोचमपल्ली में शुरू हुआ, जब विनोबा भावे की अपील के बाद वी. रामचंद्र रेड्डी ने 100 एकड़ दान की — यह वैधानिक सीमा का स्वैच्छिक समकक्ष था।
प्रश्न 'कानूनी रूप से निर्धारित अधिकतम आकार' की परिभाषा दे रहा है, इसलिए उत्तर रेखांकित पंक्ति है। बाकी तीन संबंध, अनुबंध या खेतों की बनावट बदलते हैं — अनुमत क्षेत्रफल कभी नहीं।
- जोतों के समेकन को आकार का नियम मान लेना। वह टुकड़ों को एक खंड में मिलाता है और कुल क्षेत्रफल को छूता तक नहीं।
- यह मान लेना कि सीमा का कोई एक राष्ट्रीय आँकड़ा है। भूमि राज्य का विषय है, इसलिए हदें राज्य-दर-राज्य और भूमि की गुणवत्ता के अनुसार अलग हैं, और भारत के लिए कोई एक एकड़-संख्या नहीं बताई जा सकती।
- यह मान लेना कि सीलिंग में कोई छूट नहीं थी। छूटें बहुत थीं — बाग़ान, फलोद्यान, सहकारी खेत तथा धार्मिक या धर्मार्थ न्यास आदि के लिए — और यही बड़ा कारण है कि इतनी कम अधिशेष भूमि वास्तव में वसूली जा सकी।
BPSC परिभाषा देकर पद पूछता है और चारों विकल्प उसी पाठ्यक्रम-खंड के भीतर रखता है, ताकि जिसे विषय आधा-अधूरा याद है उसे भी यह जानना पड़े कि कौन-सा स्तंभ क्या करता है। UPSC भूमि सुधार तक उसके परिणामों और अपवादों के रास्ते आता है — सीलिंग क़ानूनों के बारे में कौन-सा कथन सही है, भूदान आंदोलन की शुरुआत किससे हुई, तेभागा के किसान क्या माँग रहे थे — न कि कोई पद बताने को कहकर।
स्वतंत्र भारत में भूमि सुधारों के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन-सा कथन सही है ?
- (a) सीलिंग क़ानून पारिवारिक जोतों को लक्ष्य करते थे, व्यक्तिगत जोतों को नहीं।
- (b) भूमि सुधारों का मुख्य उद्देश्य सभी भूमिहीनों को कृषि भूमि उपलब्ध कराना था।
- (c) इसके परिणामस्वरूप नकदी फ़सलों की खेती प्रमुख रूप ले गई।
- (d) भूमि सुधारों ने सीलिंग की हदों में कोई छूट नहीं दी।
उत्तर(b) भूमि सुधारों का मुख्य उद्देश्य सभी भूमिहीनों को कृषि भूमि उपलब्ध कराना था।
वही सीलिंग क़ानून, इस दृष्टि से परखे गए कि वे किसलिए थे और चले कैसे — और इस कथन को अस्वीकार करना कि सीलिंग में कोई छूट नहीं थी, इस विषय का सबसे उपयोगी तथ्य है कि इतनी कम अधिशेष भूमि कभी वसूली क्यों जा सकी।
आचार्य विनोबा भावे के भूदान आंदोलन की शुरुआत में निम्नलिखित में से कौन-सा स्थान उससे जुड़ा था ?
- (a) उदयगिरि
- (b) रापुर
- (c) पोचमपल्ली
- (d) वेंकटगिरि
उत्तर(c) पोचमपल्ली
उसी उद्देश्य तक पहुँचने का स्वैच्छिक रास्ता। भूदान भू-स्वामियों से अधिशेष भूमि दान में माँगता था; सीलिंग अधिनियम उसे क़ानून से लेते थे। दोनों 1950 और 1960 के दशकों में साथ-साथ चले, और बिहार दोनों का बड़ा रंगमंच रहा।
- अभ्यास — वास्तविक PYQ नहीं
चकबंदी, यानी जोतों का समेकन, मुख्य रूप से किस उद्देश्य से किया जाता है ?
- (a)यह तय करना कि एक परिवार अधिकतम कितनी भूमि रख सकता है
- (b)किसान के बिखरे हुए खेतों को एक सघन खंड में मिलाना
- (c)लगान वसूलने वाले बिचौलियों को समाप्त करना
- (d)काश्तकारों को स्वामित्व अधिकार देना
उत्तर(b) किसान के बिखरे हुए खेतों को एक सघन खंड में मिलाना — यह जोत की बनावट बदलता है जबकि उसका कुल क्षेत्रफल वैसा ही रहने देता है, सीलिंग क़ानून के विपरीत।
- अभ्यास — वास्तविक PYQ नहीं
संविधान की सातवीं अनुसूची में 'भूमि, अर्थात् भूमि में या उस पर अधिकार, भू-धृतियाँ' किस सूची में आता है ?
- (a)संघ सूची
- (b)समवर्ती सूची
- (c)राज्य सूची
- (d)संसद की अवशिष्ट शक्तियाँ
उत्तर(c) राज्य सूची — प्रविष्टि 18, और ठीक इसीलिए सीमा की हदें तथा काश्तकारी के नियम राष्ट्रीय स्तर पर तय होने के बजाय राज्य-दर-राज्य भिन्न हैं।