निम्नलिखित शृंखला में ? के स्थान पर क्या आएगा ? 117, 98, 80, 64, ?, 42
- (a)51
- (b)55
- (c)46
- (d)48
सही उत्तर — (a) 51। छपे हुए पदों के बीच पहले अन्तर निकालिए: 117 − 98 = 19, 98 − 80 = 18, 80 − 64 = 16। ये अन्तराल स्थिर नहीं हैं, इसलिए यह समान्तर श्रेढ़ी नहीं है; पर देखिए कि अन्तराल स्वयं कैसे बदल रहे हैं — 19 से 18 में 1 की गिरावट है और 18 से 16 में 2 की। अन्तरों के अन्तर हैं −1, −2, और नियम आगे −3, −4 के रूप में चलता है। इससे शेष अन्तराल बनते हैं 16 − 3 = 13 और 13 − 4 = 9। अतः लुप्त पद है 64 − 13 = 51, और उसके बाद का पद है 51 − 9 = 42। यह 42 ही इस प्रश्न का पूरा मर्म है। बीपीएससी ने लुप्त पद के बजाय अन्तिम पद छाप दिया है, इसलिए शृंखला अपने साथ अपना जाँच-अंक लिए चलती है: सही केवल वही नियम हो सकता है जो ठीक 42 पर आकर बैठे, और ऐसा करने वाला एकमात्र विकल्प 51 है। बाक़ी को जाँचिए तो हर एक इस जाँच पर टूट जाता है। 55 चुनने पर अन्तराल 9 और फिर 13 बनते हैं — तब अन्तरों को घटना, घटना, घटना और फिर बढ़ना पड़ता, जो किसी एक नियम से नहीं निकलता। 46 चुनने पर अन्तराल 18 और फिर 4 बनते हैं, अर्थात् एक ही चरण में 14 की छलाँग, जबकि पहले हर चरण 1 या 2 से बदला था। 48 चुनने पर अन्तराल 16 और फिर 6 बनते हैं, जो पहले वाला 16 दोहराकर फिर 10 से ढह जाता है। केवल 51 ही रिक्त स्थान में घुसने वाले और उससे निकलने वाले, दोनों चरणों को एक ही सुसंगत नियम मनवाता है, इसलिए (a) ही उत्तर है।
- (b)55 — उस अभ्यर्थी के लिए बिछाया गया जाल जो यह तो पकड़ लेता है कि अन्तराल गिर रहे हैं, पर कितना गिर रहे हैं यह नहीं। 55, 64 से देखने में विश्वसनीय लगने वाले 9 नीचे बैठता है, और 9 सचमुच इस शृंखला में आने वाला एक अन्तराल है — पर वह अन्तिम अन्तराल है, चौथा नहीं। रिक्त स्थान में 55 रखने पर 55 से 42 तक 13 का अन्तराल बचता है, अर्थात् अन्तर चलते 19, 18, 16, 9, 13 — अन्त में फिर बढ़ते हुए। जिस शृंखला के अन्तराल घटकर फिर बढ़ें, उसका कोई एक नियम होता ही नहीं।
- (c)46 — यह अन्तरालों की गिरावट को त्वरित मानने के बजाय एकसमान पढ़ लेने से आता है — अगले अन्तराल को फिर 18 मान लेने पर 64 − 18 = 46 मिलता है। पर इससे 46 से छपे हुए 42 तक ढकने को केवल 4 बचता है, जबकि पिछला अन्तराल 18 था। छपा हुआ अन्तिम पद ठीक वही है जो इस पाठ को उघाड़ देता है।
- (d)48 — यह अन्तिम गणना किए गए 16 के अन्तराल को दोहराने से आता है, जिससे 64 − 16 = 48 मिलता है। इसमें यह तथ्य अनदेखा रह जाता है कि अन्तराल पहले ही दो बार गिर चुके हैं, और इससे छपे हुए 42 तक केवल 6 का अन्तराल बचता है — एक ही चरण में 10 की गिरावट, जबकि प्रतिरूप कभी 2 से अधिक नहीं बदला है।
संख्या-शृंखला का प्रश्न परिमित अन्तर (फ़ाइनाइट डिफ़रेंस) विधि से हल होता है, और यह प्रक्रिया प्रतिभा की नहीं, यंत्रवत् है। लगातार पदों के बीच के अन्तराल दूसरी पंक्ति में लिख लीजिए। यदि वह पंक्ति स्थिर है, तो शृंखला समान्तर है और काम पूरा। यदि नहीं, तो अन्तरालों के अन्तराल तीसरी पंक्ति में लिखिए और फिर देखिए। अधिकांश परीक्षा-शृंखलाएँ दूसरी या तीसरी पंक्ति पर ही खुल जाती हैं, क्योंकि प्रश्न-निर्माता उन्हें निम्न-कोटि के नियमों से बनाते हैं: स्थिर अन्तर, स्थिर अनुपात, ऐसा अन्तर जो स्वयं किसी सरल प्रतिरूप में चले, अथवा वर्गों, घनों, अभाज्य संख्याओं या लगातार पूर्णांकों के गुणनफल से बने पद। जब अन्तर बैठने से इनकार कर दें, तो रणनीति बदल दीजिए — लगातार पदों को भाग देकर गुणात्मक नियम जाँचिए, एक-दूसरे में गुँथी हुई एकान्तर-पद शृंखलाएँ खोजिए, या पदों को n², n³, n(n+1) और उनके छोटे-मोटे विचलनों के सामने रखकर देखिए।
दो आदतें इन्हें अनुमान से हटाकर अंकगणित बना देती हैं। पहली है हर छपे हुए पद का उपयोग करना, केवल रिक्त स्थान से पहले वालों का नहीं। यहाँ रिक्त स्थान पाँचवें पर है और 42 छठे पर छपा है, इसलिए किसी भी सम्भावित उत्तर की दो बार जाँच हो सकती है — एक बार भीतर जाते हुए और एक बार बाहर निकलते हुए — और यह दोहरी जाँच चार में से तीन विकल्पों को सीधे मार देती है। प्रश्न-निर्माता रिक्त स्थान को बीच में ठीक इसीलिए रखते हैं कि यह सम्भव हो, और अभ्यर्थी केवल आगे की ओर गणना करके अंक गँवा बैठते हैं। दूसरी आदत है उस नियम को वरीयता देना जो सबसे सहज ढंग से बैठता हो। अन्तराल 19, 18, 16, 13, 9 क्रमशः 1, 2, 3, 4 से गिरते हैं — एक त्रिभुजाकार प्रतिरूप, और अस्थिर अन्तर जितना सरल हो सकता है लगभग उतना ही। यह भी ध्यान दीजिए कि इससे पूरी शृंखला बन्द रूप में लिखी जा सकती है: लगातार पद पहले 19 से गिरते हैं, फिर हर बार एक कम से, इसलिए अनुक्रम है 117, 98, 80, 64, 51, 42, और अगला अन्तराल 5 होता, जिससे 37 मिलता। परीक्षा के दबाव में अंकगणित केवल तीन घटाव और एक जाँच है; उस जाँच को कर लेने का अनुशासन ही 51 को 55 से अलग करता है।
- छपी हुई शृंखला के पहले अन्तर: 19, 18, 16, 13, 9 — पहले 1 से, फिर 2 से, फिर 3 से, फिर 4 से गिरते हुए (दूसरे अन्तर −1, −2, −3, −4)।
- अतः पूरी शृंखला है 117, 98, 80, 64, 51, 42, और 42 के बाद का पद 42 − 5 = 37 होता।
- जब रिक्त स्थान किसी छपी हुई शृंखला के बीच में हो, तो हर सम्भावित उत्तर की जाँच दोनों दिशाओं में हो सकती है; 64 − x = 13 और x − 42 = 9, दोनों को केवल 51 सन्तुष्ट करता है।
- जिन मानक परिवारों से बीपीएससी की संख्या-शृंखला बनती है: स्थिर अन्तर, स्थिर अनुपात, समान्तर श्रेढ़ी में चलते अन्तर, थोड़े विचलन वाले पूर्ण वर्ग या घन, n(n+1) जैसे लगातार पूर्णांकों के गुणनफल, तथा दो एकान्तर उप-शृंखलाएँ।
- 70वीं संयुक्त प्रतियोगिता परीक्षा की इस पुनर्परीक्षा (4 जनवरी 2025) के प्रथम प्रश्नपत्र में 150 अंकों के 150 प्रश्न हैं और हर ग़लत उत्तर पर एक-तिहाई अंक काटा जाता है — इसलिए ऐसा शृंखला-प्रश्न, जिसकी जाँच दोनों दिशाओं में हो सकती है, प्रश्नपत्र के उन गिने-चुने प्रश्नों में है जहाँ अभ्यर्थी ऋणात्मक अंकन का जोखिम उठाए बिना निश्चयपूर्वक निशान लगा सकता है।
अन्तराल 1, 2, 3, 4 से गिरते हैं। रेखांकित दोनों पंक्तियाँ ही जाँच हैं: 51 एकमात्र ऐसा विकल्प है जो 64 से 13 नीचे भी है और छपे हुए 42 से 9 ऊपर भी।
- केवल रिक्त स्थान से पहले वाले पद से आगे की ओर गणना करना और उसके बाद छपे हुए पदों से कभी जाँच न करना — यह अंक गँवाने का सबसे आम तरीक़ा है।
- यह मान लेना कि गिरता हुआ अन्तर एक निश्चित मात्रा से ही गिरेगा। यहाँ वह 1, फिर 2, फिर 3, फिर 4 से गिरता है, और उसे स्थिर −2 पढ़ लेने पर 46 निकल आता है।
- शृंखला में कहीं और आ चुके अन्तराल को दोबारा प्रयोग कर लेना। 9 का अन्तराल वास्तविक है, पर वह अन्तिम चरण का है, चौथे का नहीं।
बीपीएससी तीन-चार शुद्ध तर्कशक्ति के प्रश्न सामान्य अध्ययन के प्रथम प्रश्नपत्र में ही रख देता है — संख्या-शृंखला, दिशा-ज्ञान, घड़ी और कैलेंडर, कूट-लेखन — क्योंकि राज्य सेवाओं में प्रारम्भिक स्तर पर कोई अलग अभिरुचि प्रश्नपत्र है ही नहीं, इसलिए इन पर उतना ही एक अंक मिलता है जितना बिहार के भूगोल वाले प्रश्न पर, और ये प्रश्नपत्र के सबसे तेज़ अंक हैं। यूपीएससी ने 2011 में यह सब सीसैट के द्वितीय प्रश्नपत्र में डाल दिया, जहाँ वह 33% पर केवल अर्हकारी है, और इसीलिए यूपीएससी की तैयारी करता हुआ बीपीएससी का अभ्यर्थी इस अंकगणित को मुख्य प्रश्नपत्र की समय-योजना में वापस लाने को बाध्य है।
निम्नलिखित संख्या-शृंखला में प्रश्नवाचक चिह्न (?) के स्थान पर क्या आएगा? 132 156 ? 210 240 272
- (a) 196
- (b) 182
- (c) 199
- (d) 204
उत्तर(b) 182
69वीं संयुक्त प्रतियोगिता परीक्षा का ठीक इसी प्रकार का प्रश्न, और हल भी ठीक उसी दो-तरफ़ा जाँच से: रिक्त स्थान तीसरे पर है और उसके बाद तीन पद छपे हैं, अन्तराल चलते हैं 24, 26, 28, 30, 32, और 182 ही एकमात्र ऐसा मान है जो अपने पहले वाले 156 और अपने बाद वाले 210, दोनों के अनुरूप है। वे पद 11×12, 12×13, 13×14 इत्यादि भी हैं — यह याद दिलाता है कि जब अकेले अन्तर बेढंगे दिखें तो n(n+1) जाँच लेनी चाहिए।
- अभ्यास — वास्तविक विगत वर्ष प्रश्न नहीं
निम्नलिखित शृंखला में ? के स्थान पर क्या आएगा ? 7, 14, 28, 56, ?, 224
- (a)98
- (b)112
- (c)120
- (d)168
उत्तर(b) 112 — प्रत्येक पद अपने से पहले वाले का दुगुना है, इसलिए 56 × 2 = 112, और जाँच टिकती है क्योंकि 112 × 2 = 224 है, जो छपा हुआ अन्तिम पद है।
- अभ्यास — वास्तविक विगत वर्ष प्रश्न नहीं
निम्नलिखित शृंखला में ? के स्थान पर क्या आएगा ? 2, 6, 12, 20, ?, 42
- (a)28
- (b)30
- (c)32
- (d)36
उत्तर(b) 30 — पद लगातार पूर्णांकों के गुणनफल हैं, 1×2, 2×3, 3×4, 4×5, 5×6, 6×7, इसलिए लुप्त पद 5 × 6 = 30 है, और 6 × 7 = 42 इसकी पुष्टि कर देता है। अन्तरों के रूप में पढ़ें तो अन्तराल हैं 4, 6, 8, 10, 12।