संथाल हुल (विद्रोह) आदिवासी आंदोलन कब हुआ था ?
- (a)1855-56
- (b)1854
- (c)1858-59
- (d)1857-58
सही — (a) 1855-56। हुल का आरम्भ 30 जून 1855 को हुआ, जब भाई सिधु और कान्हू मुर्मू ने राजमहल की पहाड़ियों में भोगनाडीह नामक स्थान पर लगभग दस हज़ार संथालों को एकत्र किया और घोषणा की कि महान आत्मा ठाकुर बोंगा ने उन्हें आदेश दिया है कि दिकुओं को — महाजनों, ज़मींदारों और कम्पनी को — खदेड़ बाहर करें और संथाल राज स्थापित करें। उनके भाई चाँद और भैरव ने उनके साथ कमान सँभाली। जो हुआ वह दंगा नहीं, युद्ध था: विद्रोही टुकड़ियों ने रेलवे के बंगले जलाए, पाकुड़ को धमकी दी, और नारायणपुर में कम्पनी की सेना को अपमानजनक पराजय दी; कम्पनी को यह विद्रोह तोड़ने से पहले मुर्शिदाबाद से नियमित रेजिमेंट और हाथी मँगाने पड़े। मृतकों का अनुमान दस से पन्द्रह हज़ार तक जाता है। लड़ाई की अवधि 30 जून 1855 से 3 जनवरी 1856 तक मानी जाती है — ठीक वही अवधि जो यह विकल्प देता है। परिणाम उत्तर का दूसरा आधा हिस्सा है और अधिकतर प्रश्न वस्तुतः उसी को परखते हैं: कम्पनी ने सोंथाल परगना अधिनियम, 1855 का अधिनियम 37, के द्वारा संथाल परगना नाम की एक अलग प्रशासनिक इकाई बनाई, और दो दशक बाद संथाल परगना काश्तकारी अधिनियम, 1876 ने संथाल की भूमि किसी ग़ैर-संथाल को हस्तांतरित करना अवैध कर दिया — एक संरक्षक भूमि-क़ानून, जो सीधे इसी विद्रोह से जन्मा और जो सारतः आज भी लागू है। झारखंड 30 जून को हूल दिवस के रूप में मनाता है; यह भू-भाग 15 नवम्बर 2000 को झारखंड बनने तक बिहार का अंग था, और इसी कारण हुल सीधे-सीधे BPSC के पाठ्यक्रम में बैठता है।
- (b)1854 — एक वर्ष पहले का, और हुल की किसी भी घटना से इसका मेल नहीं बैठता। यह उसी प्रकार का विकल्प है जो उस अभ्यर्थी को पकड़ता है जिसे '1850 का दशक' तो याद है पर वर्ष नहीं; इसका उपाय यह है कि विद्रोह को एक ही तिथि से बाँध लीजिए — 30 जून 1855, भोगनाडीह की सभा का दिन, और इसीलिए 30 जून हूल दिवस है।
- (c)1858-59 — यह हुल को 1857 के विद्रोह के बाद रख देता है, जो वास्तविक क्रम को उलट देता है। 1858 तक संथाल विद्रोह कब का समाप्त हो चुका था और 1855 के अधिनियम के अन्तर्गत संथाल परगना एक अलग ज़िले के रूप में गठित भी हो चुका था; 1859-60 के खाने में जो बैठता है वह है बंगाल का नील विद्रोह — भिन्न प्रतिभागियों वाला एक भिन्न आंदोलन।
- (d)1857-58 — सबसे लुभावना ग़लत उत्तर, क्योंकि यह हुल को 1857 के विद्रोह में मिला देता है — और दोनों समय तथा स्थान में सचमुच पास-पास हैं। पर वे अलग कारणों वाली अलग घटनाएँ हैं: हुल महाजनों और भूमि हड़पने वालों के विरुद्ध एक आदिवासी तथा कृषक विद्रोह था, जो 10 मई 1857 को मेरठ में सिपाहियों के विद्रोह से पहले ही लड़ा और दबाया जा चुका था।
संथाल हुल कम्पनी शासन की पहली शताब्दी में बिखरे आदिवासी विद्रोहों में सबसे बड़ा है, और वह एक ऐसे प्रतिरूप में बैठता है जिसे पहचानने की अपेक्षा पाठ्यक्रम करता है। स्थायी बन्दोबस्त और वन-क्षेत्रों तक राजस्व प्रशासन के विस्तार ने बाहरी लोगों को भीतर पहुँचा दिया — क़ानूनी हक़ वाले ज़मींदार, विनाशकारी ब्याज पर उधार देने वाले महाजन, नई रेल के लिए मज़दूर भर्ती करने वाले ठेकेदार — और जिन आदिवासी समुदायों ने प्रथागत अधिकार के अन्तर्गत भूमि साफ़ कर उसे जोता था, वे उसी भूमि पर काश्तकार, ऋणी और बँधुआ मज़दूर बन गए। संथालों को स्वयं राजमहल की पहाड़ियों के दामिन-इ-कोह क्षेत्र में इसीलिए बसाया गया था कि वे उसे साफ़ कर खेती करें, इसलिए विश्वासघात की चुभन और तीखी थी। विद्रोह की शब्दावली धार्मिक थी — एक दैवी आदेश, यह आश्वासन कि कम्पनी की गोलियाँ पानी हो जाएँगी — और उसका कार्यक्रम सरल था: दिकुओं को बाहर करो। यही आकृति 1831-32 के कोल विद्रोह में और 1899-1900 के बिरसा मुंडा के उलगुलान में दोहराई जाती है, और औपनिवेशिक उत्तर हर बार वही रहा — कठोर दमन और आदिवासी भूमि के लिए एक विशेष विधिक व्यवस्था का मिश्रण।
इस समूह के लगभग हर तिथि-प्रश्न को दो लंगर सुलझा देते हैं। पहला, हुल 1857 से पहले आता है — यह विद्रोह-पूर्व का अन्तिम बड़ा उभार है, और कोई भी विकल्प जो उसे 1857 में या उसके बाद रखे, केवल इसी आधार पर ख़ारिज किया जा सकता है। दूसरा, उन्नीसवीं सदी के जन-विद्रोहों का कालक्रम इस प्रकार चलता है — कोल 1831-32, संथाल हुल 1855-56, 1857 का विद्रोह, नील विद्रोह 1859-60, पाबना 1873-76, दक्कन दंगे 1875, मुंडा उलगुलान 1899-1900। यह रीढ़ याद कर लीजिए और इस विषय के विकल्प-समूह ढह जाते हैं, क्योंकि उनमें से हर एक इसी क्रम की किसी एक निकटता को परखता है। घटना के साथ उसका परिणाम भी जोड़े रखना उचित है, क्योंकि UPSC विशेष रूप से यह पूछना पसंद करता है कि विद्रोह शान्त होने के बाद सरकार ने क्या किया, न कि वह कब हुआ: हुल के लिए संथाल परगना ज़िला और ग़ैर-संथालों को भूमि हस्तांतरण पर रोक; उलगुलान के लिए 1908 का छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम।
- हुल 30 जून 1855 को भोगनाडीह में आरम्भ हुआ, जहाँ सिधु और कान्हू मुर्मू ने लगभग दस हज़ार संथालों को एकत्र किया; विद्रोह 3 जनवरी 1856 तक दबा दिया गया
- इसका घोषित उद्देश्य दिकुओं — महाजनों, ज़मींदारों और ईस्ट इंडिया कम्पनी — को खदेड़कर संथाल स्वशासन स्थापित करना था; मृतकों का अनुमान 10,000–15,000 तक जाता है
- सिधु और कान्हू के साथ कमान में उनके भाई चाँद और भैरव भी थे; संथालों ने नारायणपुर में कम्पनी की सेना को हराया, फिर महेशपुर के पास उन्हें तोड़ दिया गया
- परिणाम: सोंथाल परगना अधिनियम, 1855 का अधिनियम 37, ने संथाल परगना को एक अलग ज़िले के रूप में बनाया, और संथाल परगना काश्तकारी अधिनियम, 1876, ने संथाल भूमि का ग़ैर-संथालों को हस्तांतरण वर्जित कर दिया
- 30 जून हूल दिवस के रूप में मनाया जाता है; संथाल परगना 15 नवम्बर 2000 को झारखंड बनने तक बिहार के भीतर था
अलग-अलग वर्ष नहीं, रीढ़ याद कीजिए: कोल → संथाल हुल → 1857 → नील → पाबना → दक्कन → उलगुलान। यहाँ हर विकल्प इसी क्रम की किसी एक निकटता को परखता है, और 1858-59 तथा 1857-58 दोनों इसलिए विफल हैं कि वे हुल को उन घटनाओं के बाद रख देते हैं जिनसे वह पहले हुआ था।
- हुल को 1857 के विद्रोह में मिला देना — वह दो वर्ष पहले आरम्भ हुआ और सिपाही विद्रोह फूटने से पहले ही समाप्त हो चुका था
- 1876 के संथाल परगना काश्तकारी अधिनियम को ग़लत विद्रोह से जोड़ देना; बिरसा मुंडा के उलगुलान के बाद आने वाला अधिनियम 1908 का छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम है
- यह मान लेना कि आदिवासी विद्रोह केवल अंग्रेज़ों के विरुद्ध था — हुल ने पहले महाजन और ज़मींदार का नाम लिया, कम्पनी का दूसरे क्रम पर
BPSC हुल को तिथि या नेता के रूप में पूछता है, क्योंकि संथाल परगना 2000 तक बिहार का भू-भाग था और इस आंदोलन को क्षेत्रीय इतिहास की तरह पढ़ाया जाता है; अपेक्षा रखिए कि उत्तर किसी एक वर्ष पर टिकेगा। UPSC ने इसे दो बार इसके बजाय परिणाम और कालक्रम के रूप में पूछा है — विद्रोह शान्त होने के बाद औपनिवेशिक सरकार ने क्या किया, और हुल 1857 तथा नील विद्रोह के सापेक्ष कहाँ बैठता है — इसलिए इस घटना को उसके क़ानून और उसके पड़ोसियों के साथ जोड़कर ही याद करना होगा।
संथाल विद्रोह के शान्त हो जाने के बाद औपनिवेशिक सरकार ने कौन-सा/से उपाय किया/किए? 1. 'संथाल परगना' नामक क्षेत्र बनाए गए। 2. किसी संथाल के लिए किसी ग़ैर-संथाल को भूमि हस्तांतरित करना अवैध हो गया। नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए :
- (a) केवल 1
- (b) केवल 2
- (c) 1 और 2 दोनों
- (d) न तो 1 और न ही 2
उत्तर(c) 1 और 2 दोनों
वही विद्रोह, पर दूसरे सिरे से पूछा गया — कब हुआ नहीं, बल्कि उससे निकला क्या। 1855 का संथाल परगना ज़िला और 1876 के काश्तकारी अधिनियम के अन्तर्गत भूमि हस्तांतरण पर रोक — ये दो परिणाम तिथि के साथ-साथ याद रखने लायक़ हैं।
निम्नलिखित घटनाओं पर विचार कीजिए : I. नील विद्रोह II. संथाल विद्रोह III. दक्कन दंगा IV. सिपाही विद्रोह इन घटनाओं का सही कालानुक्रम है :
- (a) IV, II, I, III
- (b) IV, II, III, I
- (c) II, IV, III, I
- (d) II, IV, I, III
उत्तर(d) II, IV, I, III
हुल को ठीक वहीं रखता है जहाँ इस प्रश्न को उसकी ज़रूरत है — क्रम में सबसे पहले, 1857 के सिपाही विद्रोह और 1859-60 के नील विद्रोह से आगे। जो अभ्यर्थी यह सूची क्रम में लगा सकता है, वह यहाँ एक भी तिथि याद किए बिना विकल्प (c) और (d) ख़ारिज कर देगा।
फराजी आंदोलन के संस्थापक कौन थे ?
- (a) हाजी शरीयतुल्लाह
- (b) सैय्यद अहमद
- (c) दूधू मियां
- (d) उपरोक्त में एक से अधिक
उत्तर(a) हाजी शरीयतुल्लाह
दिसम्बर 2024 में हुए 70वीं CCE के पत्र ने — जो इस पुनर्परीक्षा से अलग पत्र है — इसी परिवार की पड़ोसी वस्तु पूछी थी: पूर्वी भारत का 1857-पूर्व का एक जन-आंदोलन, जो ज़मींदारों और नील बागान मालिकों के विरुद्ध था। दोनों पत्र विद्रोह-पूर्व के उभारों की उसी छोटी तालिका का प्रतिफल देते हैं, जिसमें नेता और तिथियाँ जुड़ी हों।
- अभ्यास प्रश्न — वास्तविक PYQ नहीं
1855-56 के संथाल हुल का नेतृत्व किसने किया था ?
- (a)बिरसा मुंडा
- (b)सिधु और कान्हू मुर्मू
- (c)तिलका मांझी
- (d)जतरा भगत
उत्तर(b) सिधु और कान्हू मुर्मू — वही भाई जिन्होंने 30 जून 1855 को भोगनाडीह में संथालों को एकत्र किया था; बिरसा मुंडा ने चार दशक बाद 1899-1900 का उलगुलान चलाया।
- अभ्यास प्रश्न — वास्तविक PYQ नहीं
संथाल परगना काश्तकारी अधिनियम, 1876 में मुख्यतः किसका उपबंध था ?
- (a)बंगाल में ज़मींदारी प्रथा का उन्मूलन
- (b)संथाल भूमि के ग़ैर-संथालों को हस्तांतरण पर रोक
- (c)राजस्व का सदा के लिए निर्धारण
- (d)कम्पनी की सेना में संथालों की भर्ती
उत्तर(b) संथाल भूमि के ग़ैर-संथालों को हस्तांतरण पर रोक — हुल के बाद आया वह संरक्षक भूमि-क़ानून, जिसके साथ 1855 में संथाल परगना ज़िले का गठन भी जुड़ा है।