नीचे प्रतिरोधकों का एक अनंत संयोजन दिया गया है, जिसमें प्रत्येक प्रतिरोधक का प्रतिरोध R = 4 Ω है । A और B बिंदुओं के बीच नेट प्रतिरोध क्या है ? (प्रत्येक प्रतिरोध का मान एकसमान, R = 4 है)
- (a)0 Ω
- (b)2 + 2√5 Ω
- (c)2 + √5 Ω
- (d)∞ Ω
सही — B, 2 + 2√5 Ω. एक अनंत सीढ़ी में से एक खंड हटा देने पर भी वह स्वयं जैसी ही दिखती है, इसलिए A और B के बीच के पूरे जाल को एक ही प्रतिरोध X मान लीजिए । सामने एक और समरूप खंड जोड़ने पर भी वही X मिलना चाहिए — पहले श्रेणीक्रम में एक R, फिर शेष जाल X के समांतर क्रम में एक R — अतः X = R + (R x X)/(R + X) । भिन्न हटाने पर X^2 - R x X - R^2 = 0 मिलता है, जिसका धनात्मक मूल X = R(1 + √5)/2 है । R = 4 Ω रखने पर X = 4(1 + √5)/2 = 2(1 + √5) = 2 + 2√5 Ω, अर्थात् लगभग 6.47 Ω ।
- (a)0 Ω — शून्य प्रतिरोध का अर्थ होता कि A और B पूर्ण लघुपथ (short) से जुड़े हैं । परिमित 4 Ω प्रतिरोधकों से बना जाल, चाहे जैसे भी जोड़ा जाए, दो बिंदुओं के बीच कभी शून्य प्रतिरोध नहीं दे सकता — जब तक कि उन्हें कोई सादा तार न जोड़ता हो, और यह सीढ़ी ऐसा नहीं करती ।
- (c)2 + √5 Ω — इसमें '2 +' वाला सही भाग तो रह जाता है, पर 4(1 + √5)/2 का सरलीकरण गलत हो जाता है । 4 को ठीक से बाँटने पर 4/2 + (4/2)√5 = 2 + 2√5 मिलता है, अर्थात् √5 वाले पद पर भी 2 का गुणक आना चाहिए — मान 2 + 2√5 है, 2 + √5 नहीं ।
- (d)∞ Ω — प्रतिरोधकों की अनंत संख्या से प्रतिरोध अनंत हो जाना आवश्यक नहीं है । हर समांतर भुजा धारा को एक अतिरिक्त मार्ग देती है, इसलिए श्रेणी एक परिमित सीमा R(1 + √5)/2 तक ही बढ़ती है । केवल वह शृंखला जिसमें कोई समांतर मार्ग न हो (अनंत तक शुद्ध श्रेणीक्रम) ∞ की ओर अपसरित होती ।
एक अनंत दोहराव वाला (सीढ़ीनुमा) जाल स्व-समरूपता (self-similarity) से हल किया जाता है: चूँकि एक खंड हटाने पर भी वैसा ही अनंत जाल बचता है, इसलिए पूरे जाल का प्रतिरोध उसी जाल के सामने एक खंड जोड़ देने पर भी उतना ही रहता है । यही एक शर्त अनंत परिपथ को एक बीजगणितीय समीकरण में बदल देती है, जिसे आप हल कर सकते हैं ।
प्रतिरोधकों को एक-एक करके जोड़ने की कोशिश मत कीजिए — अज्ञात कुल X मान लीजिए और इस तथ्य का उपयोग कीजिए कि एक और खंड जोड़ने पर भी X ही बनता है । यहाँ एक खंड का अर्थ है श्रेणीक्रम में एक R, जो आगे उस R को पोषित करता है जो शेष सीढ़ी X के समांतर क्रम में है; इससे X = R + (R x X)/(R + X) मिलता है । यह द्विघात X^2 - R x X - R^2 = 0 बन जाता है; धनात्मक मूल लीजिए, क्योंकि प्रतिरोध ऋणात्मक नहीं हो सकता ।
- अनंत सीढ़ी स्व-समरूप होती है, इसलिए सामने एक समरूप खंड जोड़ने पर भी उसका प्रतिरोध अपरिवर्तित रहता है ।
- स्व-संगति की शर्त X = R + (R x X)/(R + X) है, जो घटकर X^2 - R x X - R^2 = 0 हो जाती है ।
- धनात्मक मूल X = R(1 + √5)/2 है, अर्थात् जाल का प्रतिरोध R का स्वर्ण अनुपात (1 + √5)/2 ≈ 1.618 गुना होता है ।
- R = 4 Ω के लिए X = 2(1 + √5) = 2 + 2√5 Ω ≈ 6.47 Ω ।
- परिमित प्रतिरोधकों की अनंत शृंखला एक परिमित मान पर अभिसरित होती है — वह न 0 है और न ∞ ।
- स्व-समरूपता का उपयोग करने के बजाय प्रतिरोधकों को एक-एक पद जोड़ते जाना ।
- यह मान लेना कि अनंत प्रतिरोधक होने से प्रतिरोध अनंत ही होगा ।
- द्विघात का ऋणात्मक मूल ले लेना — प्रतिरोध धनात्मक ही होना चाहिए ।
NDA/UPSC एक अनंत (दोहराव वाली) प्रतिरोधक सीढ़ी देकर दो बिंदुओं के बीच प्रतिरोध पूछते हैं — X मान लीजिए, स्व-संगति समीकरण लिखिए, द्विघात हल कीजिए और धनात्मक मूल रखिए ।
No directly related past PYQ was found.
- अभ्यास — वास्तविक PYQ नहीं
एक अनंत प्रतिरोधक सीढ़ी में सामने एक और समरूप खंड जोड़ देने पर कुल प्रतिरोध का क्या होता है ?
- (a)यह R से बढ़ जाता है
- (b)यह R से घट जाता है
- (c)यह बिल्कुल वही रहता है
- (d)यह दोगुना हो जाता है
Answer(c) यह बिल्कुल वही रहता है — अनंत सीढ़ी की यही स्व-समरूपता उसे हल करने देती है ।
- अभ्यास — वास्तविक PYQ नहीं
उसी अनंत सीढ़ी में प्रत्येक प्रतिरोधक R = 1 Ω हो, तो A और B के बीच नेट प्रतिरोध होगा
- (a)1 Ω
- (b)(1 + √5)/2 Ω ≈ 1.618 Ω
- (c)2 Ω
- (d)∞ Ω
Answer(b) (1 + √5)/2 Ω ≈ 1.618 Ω — प्रतिरोध R(1 + √5)/2 होता है, अर्थात् R का स्वर्ण-अनुपात गुना ।