निम्नलिखित में से कौन-सा एक, भारत में सांविधानिक निकाय नहीं है ?
- (a)राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग
- (b)राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग
- (c)राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग
- (d)राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग
सही उत्तर — A, (a) राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग । स्टेम में 'नहीं' मोटे तिरछे अक्षरों में छपा है, अतः खोजना यह है कि इनमें से कौन-सा निकाय संविधान से नहीं, किसी अधिनियम से बना है । राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग की स्थापना मानव अधिकार संरक्षण अधिनियम, 1993 के अधीन हुई है । संविधान में उसका कहीं उल्लेख नहीं है, इसलिए वह सांविधिक निकाय है, सांविधानिक नहीं । इसका व्यावहारिक अर्थ भी है : जो निकाय अधिनियम से बना हो, उसकी संरचना, शक्तियाँ और अवधि संसद साधारण विधि से बदल सकती है — जैसा 2019 के संशोधन में हुआ, जब अध्यक्ष पद की पात्रता का दायरा बढ़ाया गया और सदस्यों का कार्यकाल पाँच वर्ष से घटाकर तीन वर्ष कर दिया गया । शेष तीनों आयोग संविधान के अनुच्छेदों से सीधे उत्पन्न हैं : राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग अनुच्छेद 338 से, राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग अनुच्छेद 338क से और राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग अनुच्छेद 338ख से । उन्हें बदलने के लिए संविधान संशोधन करना पड़ेगा, साधारण अधिनियम पर्याप्त नहीं होगा । एक शब्द पर ध्यान दीजिए — पुस्तिका 'constitutional' के लिए 'सांविधानिक' छापती है, जबकि पाठ्यपुस्तकों में प्रायः 'संवैधानिक' मिलता है ; दोनों का अर्थ एक ही है और 'सांविधानिक' भारतीय विधियों के हिन्दी पाठ का प्रचलित रूप है ।
- (b)राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग — राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग सांविधानिक निकाय है । वह अनुच्छेद 338क के अधीन बना है, जो 89वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2003 द्वारा जोड़ा गया । उससे पहले अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लिए एक ही संयुक्त आयोग था ; उसी संशोधन ने उसे दो भागों में बाँटकर जनजातियों के लिए अलग आयोग बनाया । इसका काम जनजातियों के लिए दिए गए संरक्षणों की निगरानी करना, विशिष्ट शिकायतों की जाँच करना और राष्ट्रपति को वार्षिक प्रतिवेदन देना है ।
- (c)राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग — राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग भी अब सांविधानिक निकाय है — अनुच्छेद 338ख के अधीन, जो 102वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2018 द्वारा जोड़ा गया । यही विकल्प इस प्रश्न में सबसे अधिक भ्रम पैदा करता है, और कारण ऐतिहासिक है : 2018 से पहले यह आयोग वास्तव में सांविधिक ही था, राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग अधिनियम, 1993 के अधीन, जो इंद्रा साहनी वाले निर्णय के बाद बना था । जिस अभ्यर्थी ने पुरानी सामग्री पढ़ी हो वह इसी को उत्तर मान बैठता है । उसी संशोधन ने अनुच्छेद 342क भी जोड़ा ।
- (d)राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग — राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग सांविधानिक निकाय है और उसका आधार अनुच्छेद 338 है । आरंभ में अनुच्छेद 338 में अनुसूचित जातियों तथा जनजातियों के लिए एक विशेष अधिकारी की व्यवस्था थी ; आगे चलकर बहु-सदस्यीय आयोग बना और 89वें संशोधन ने दोनों वर्गों के लिए अलग-अलग आयोग कर दिए, जिसके बाद अनुच्छेद 338 केवल अनुसूचित जातियों के लिए रह गया । यह आयोग भी संरक्षणों की निगरानी करता है और अपने प्रतिवेदन राष्ट्रपति को देता है, जो उन्हें संसद के समक्ष रखवाते हैं ।
भारत के लोक निकायों को उनके स्रोत से तीन वर्गों में बाँटा जाता है । सांविधानिक निकाय वे हैं जिनका उल्लेख संविधान में ही है और जिन्हें बदलने के लिए संविधान संशोधन आवश्यक है — निर्वाचन आयोग (अनुच्छेद 324), नियंत्रक-महालेखापरीक्षक (148), संघ लोक सेवा आयोग (315), वित्त आयोग (280), महान्यायवादी (76) तथा अनुच्छेद 338, 338क और 338ख वाले तीनों आयोग । सांविधिक निकाय वे हैं जो संसद या राज्य विधानमंडल के किसी अधिनियम से बनते हैं — राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग, राष्ट्रीय महिला आयोग, केंद्रीय सतर्कता आयोग, भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड । तीसरा वर्ग कार्यपालिका के प्रस्ताव से बने निकायों का है, जैसे नीति आयोग ।
यह प्रश्न प्रश्नपत्र के राजव्यवस्था खंड का है और उसी सबसे प्रचलित ढाँचे पर बना है जिसमें तीन सांविधानिक निकायों के साथ एक सांविधिक निकाय रख दिया जाता है । विकल्पों का चयन सोच-समझकर हुआ है : चारों ही आयोग हैं, चारों ही राष्ट्रीय हैं, और चारों ही संरक्षण से जुड़े हैं, इसलिए नाम देखकर छाँटना संभव नहीं — अनुच्छेद याद होना ही पड़ेगा । ध्यान रखने योग्य बात यह है कि सांविधिक होना छोटा होना नहीं है ; राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग के पास सिविल न्यायालय की शक्तियाँ हैं और वह स्वप्रेरणा से भी जाँच कर सकता है । अंतर केवल स्रोत का है, और उसी से यह तय होता है कि उसमें परिवर्तन कितनी सरलता से किया जा सकता है ।
- राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग मानव अधिकार संरक्षण अधिनियम, 1993 के अधीन बना सांविधिक निकाय है ; संविधान में उसका उल्लेख नहीं है ।
- राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग — अनुच्छेद 338 ।
- राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग — अनुच्छेद 338क, 89वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2003 द्वारा जोड़ा गया ।
- राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग — अनुच्छेद 338ख, 102वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2018 द्वारा जोड़ा गया ; उससे पहले वह 1993 के अधिनियम से बना सांविधिक निकाय था ।
- सांविधानिक निकाय संविधान से उत्पन्न होते हैं और उनमें परिवर्तन संविधान संशोधन से ही संभव है ; सांविधिक निकाय अधिनियम से बनते हैं और साधारण विधि से बदले जा सकते हैं ।
- अन्य प्रमुख सांविधानिक निकाय — निर्वाचन आयोग (324), नियंत्रक-महालेखापरीक्षक (148), संघ लोक सेवा आयोग (315), वित्त आयोग (280) ।
- राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग को अब भी सांविधिक मान लेना ; 2018 के बाद वह सांविधानिक है ।
- 'सांविधानिक' और 'सांविधिक' को एक जैसा पढ़ जाना — एक संविधान से है, दूसरा अधिनियम से ।
- किसी निकाय की शक्ति देखकर उसका दर्जा तय कर लेना ; शक्तिशाली होना और सांविधानिक होना अलग बातें हैं ।
यह प्रकरण तीन ढंग से पूछा जाता है । पहला — चार निकायों में से सांविधानिक या सांविधिक को छाँटना, जैसा यहाँ है । दूसरा — किसी निकाय का अनुच्छेद या मूल अधिनियम पूछना । तीसरा — सुमेलन, जिसमें एक ओर निकाय और दूसरी ओर अनुच्छेद या अधिनियम रखे जाते हैं । तैयारी का सबसे कारगर ढंग यह है कि एक पृष्ठ की सारणी बना ली जाए जिसमें हर प्रमुख निकाय के सामने उसका स्रोत, स्थापना का वर्ष और संबंधित संशोधन लिखा हो ; इसी सारणी से इस प्रकार के सारे प्रश्न सध जाते हैं ।
इस प्रश्न से सीधे संबंधित कोई पूर्व PYQ उपलब्ध नहीं।
- practice — not a real PYQ
निम्नलिखित में से कौन-सा एक सांविधानिक निकाय है ?
- (a)केंद्रीय सतर्कता आयोग
- (b)भारत का निर्वाचन आयोग
- (c)राष्ट्रीय महिला आयोग
- (d)नीति आयोग
उत्तर(b) भारत का निर्वाचन आयोग — वह अनुच्छेद 324 से उत्पन्न है ; केंद्रीय सतर्कता आयोग और राष्ट्रीय महिला आयोग अधिनियमों से बने हैं और नीति आयोग कार्यपालिका के प्रस्ताव से ।
- practice — not a real PYQ
राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग को किस संविधान संशोधन अधिनियम द्वारा सांविधानिक दर्जा दिया गया ?
- (a)89वाँ संशोधन
- (b)102वाँ संशोधन
- (c)103वाँ संशोधन
- (d)105वाँ संशोधन
उत्तर(b) 102वाँ संशोधन — इसी ने अनुच्छेद 338ख जोड़ा ; 89वाँ संशोधन अनुसूचित जनजाति आयोग से संबंधित है और 105वाँ संशोधन पिछड़े वर्गों की सूची बनाने की राज्यों की शक्ति से ।