स्वतंत्रता सेनानी अगधु सामंत्रा (उड़ीसा) ने ब्रिटिश-भारतीय सेना में काम किया। बाद में वे ब्रिटिश सेवा छोड़कर 1942 में आज़ाद हिन्द फौज (INA) में सम्मिलित हो गए। उनको INA द्वारा प्रथम बहादुर ग्रुप में नायक के रूप में कहाँ तैनात किया गया था?
- (a)अंदमान-निकोबार
- (b)बर्मा फ्रंट
- (c)अरुणाचल प्रदेश
- (d)असम
सही उत्तर — B, (b) बर्मा फ्रंट। इस प्रश्न का हल किसी एक व्यक्ति की जीवनी याद रखने पर नहीं, बल्कि आज़ाद हिन्द फौज के भूगोल पर टिका है — और वह भूगोल एक ही उत्तर देता है। 1942 में जब यह सेना बनी, उसका पूरा क्षेत्र दक्षिण-पूर्व एशिया था। सिंगापुर के पतन के बाद जो भारतीय सैनिक जापानी क़ब्ज़े में आए, उन्हीं में से पहली आज़ाद हिन्द फौज मोहन सिंह के नेतृत्व में खड़ी हुई, और उसका संगठन मलाया, सिंगापुर, थाईलैंड तथा बर्मा में फैला। भारत की ओर बढ़ने का एकमात्र स्थल-मार्ग बर्मा से होकर जाता था, इसलिए जो भी सैनिक भारत की दिशा में तैनात किया जाता, वह बर्मा मोर्चे पर ही जाता। 1943 में सुभाष चंद्र बोस ने इस सेना का नेतृत्व सँभाला और 21 अक्तूबर 1943 को सिंगापुर में आज़ाद हिन्द सरकार की घोषणा की। इसके बाद 1944 की शुरुआत में फौज का मुख्यालय रंगून ले जाया गया, और उसी वर्ष अराकान तथा इम्फाल-कोहिमा की ओर अभियान चला, जिसका नारा 'दिल्ली चलो' था। अर्थात् जिस पूरे कालखंड की बात प्रश्न कर रहा है, उसमें फौज की तैनाती का व्यावहारिक अर्थ बर्मा ही था। प्रश्न स्वयं कुछ ब्योरे दे देता है और उन्हें ठीक से पढ़ लेना चाहिए : स्वतंत्रता सेनानी अगधु सामंत्रा ने पहले ब्रिटिश-भारतीय सेना में काम किया, फिर 1942 में ब्रिटिश सेवा छोड़कर आज़ाद हिन्द फौज में सम्मिलित हुए, और उन्हें प्रथम बहादुर ग्रुप में नायक के रूप में तैनात किया गया। नायक भारतीय सेना की एक निम्न अधिकारी-श्रेणी है, और 'ग्रुप' इस बात का संकेत है कि तैनाती किसी सैन्य इकाई में हुई थी। इन सबको जोड़कर एकमात्र संगत उत्तर बर्मा फ्रंट बनता है, जो उस समय इस सेना का वास्तविक युद्ध-क्षेत्र था। छपाई की एक बात दर्ज करने योग्य है — पुस्तिका में राज्य का नाम 'उड़ीसा' छपा है, जो 2011 के पुनर्नामकरण से पहले का रूप है।
- (a)अंदमान-निकोबार — यह विकल्प इस समुच्चय का सबसे कुशल जाल है, क्योंकि अंदमान-निकोबार का आज़ाद हिन्द से सचमुच संबंध है — पर वह संबंध दूसरी तरह का और बाद का है। इन द्वीपों पर जापानी अधिकार 1942 में हुआ, और दिसंबर 1943 में इन्हें औपचारिक रूप से आज़ाद हिन्द सरकार को सौंपा गया; सुभाष चंद्र बोस ने पोर्ट ब्लेयर पहुँचकर तिरंगा फहराया और द्वीपों को शहीद तथा स्वराज नाम दिए। किन्तु ये द्वीप कभी युद्ध का मोर्चा नहीं बने — वहाँ कोई थल-अभियान नहीं चला, इसलिए किसी सैनिक की 'तैनाती' का अर्थ वहाँ मोर्चे पर भेजा जाना नहीं होता। इसके अलावा प्रश्न में तैनाती 1942 में फौज में सम्मिलित होने के बाद की है, जबकि द्वीपों का हस्तांतरण उसके बाद हुआ।
- (c)अरुणाचल प्रदेश — यह विकल्प कालक्रम की दृष्टि से ही असंभव है, और यही इसे काटने का सबसे साफ़ तरीक़ा है। 1942 में 'अरुणाचल प्रदेश' नाम का कोई क्षेत्र था ही नहीं; उस समय यह भाग उत्तर-पूर्व सीमांत क्षेत्र कहलाता था। अरुणाचल प्रदेश नाम 1972 में मिला, जब इसे संघ राज्यक्षेत्र बनाया गया, और 1987 में यह पूर्ण राज्य बना। इतिहास के प्रश्नों में यह जाँच बहुत काम आती है : यदि किसी विकल्प में ऐसा नाम है जो उस घटना के समय अस्तित्व में ही नहीं था, तो वह विकल्प अपने आप कट जाता है। इसके अतिरिक्त 1944 का अभियान भी इस दिशा में नहीं, बल्कि मणिपुर और नागा पहाड़ियों की ओर बढ़ा था।
- (d)असम — असम इस प्रश्न में इसलिए रखा गया है कि 1944 का अभियान उसी दिशा में बढ़ा था — इम्फाल और कोहिमा की ओर, और कोहिमा उस समय असम प्रांत के नागा पहाड़ी ज़िले में आता था। किन्तु प्रश्न 1942 में हुई तैनाती का पूछता है, और उस समय आज़ाद हिन्द फौज भारत की भूमि पर कहीं नहीं थी; उसका संगठन और उसकी छावनियाँ दक्षिण-पूर्व एशिया में थीं। सैनिक की तैनाती उस मोर्चे पर होती है जहाँ उसकी इकाई खड़ी है, और वह मोर्चा बर्मा था — भारत की ओर बढ़ने का प्रयास उसके बाद, 1944 में हुआ और वह असफल रहा। इसलिए यह विकल्प घटनाओं के क्रम को उलट देता है : जो 1944 का लक्ष्य था, उसे 1942 की तैनाती बना देता है।
आज़ाद हिन्द फौज का इतिहास दो चरणों में बँटा है और दोनों को अलग रखना आवश्यक है। पहला चरण 1942 का है : सिंगापुर के पतन के बाद जापानियों के हाथ आए भारतीय सैनिकों में से मोहन सिंह ने पहली आज़ाद हिन्द फौज खड़ी की, और उसका राजनीतिक ढाँचा रास बिहारी बोस के नेतृत्व वाली इंडियन इंडिपेंडेंस लीग ने दिया, जिसका सम्मेलन बैंकॉक में हुआ। जापानी नेतृत्व के साथ मतभेद के कारण यह पहली फौज उसी वर्ष के अंत में भंग हो गई। दूसरा चरण 1943 का है : सुभाष चंद्र बोस दक्षिण-पूर्व एशिया पहुँचे, फौज का नेतृत्व सँभाला और 21 अक्तूबर 1943 को सिंगापुर में आज़ाद हिन्द सरकार की घोषणा की। इसके बाद मुख्यालय रंगून ले जाया गया और 1944 में अराकान तथा इम्फाल-कोहिमा की ओर अभियान चला। फौज की इकाइयाँ ब्रिगेडों और समूहों में संगठित थीं, जिनमें एक रानी झाँसी रेजिमेंट भी थी — भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की महिला सैन्य इकाई।
इस प्रश्न की बनावट अपने आप में एक सीख है : उसमें व्यक्ति का नाम अपरिचित है, पर उत्तर तक पहुँचने के लिए नाम जानना आवश्यक नहीं। जो जानकारी चाहिए वह प्रश्न में और सामान्य इतिहास-बोध में पहले से मौजूद है — सेना कौन-सी थी, वर्ष कौन-सा था, और उस वर्ष उस सेना का क्षेत्र कहाँ था। ऐसे प्रश्नों में अभ्यर्थी प्रायः इसलिए घबरा जाता है कि उसने वह नाम कभी नहीं पढ़ा, और घबराहट में या तो प्रश्न छोड़ देता है या अनुमान लगा बैठता है। सही रणनीति यह है कि पहले यह पूछा जाए कि विकल्पों में से कौन-सा उस काल और उस संगठन के भूगोल से मेल खाता है। यहाँ चार में से एक विकल्प कालक्रम से ही असंभव है, एक का संबंध युद्ध-मोर्चे से नहीं, और एक घटनाओं का क्रम उलट देता है। ऐसे छँटाई के बाद जो बचता है, वही उत्तर है — और वह स्वतंत्र रूप से भी सही निकलता है।
- 1942 में सिंगापुर के पतन के बाद मोहन सिंह के नेतृत्व में पहली आज़ाद हिन्द फौज बनी और उसका राजनीतिक ढाँचा रास बिहारी बोस की इंडियन इंडिपेंडेंस लीग ने दिया; मतभेदों के कारण यह पहली फौज उसी वर्ष भंग हो गई।
- सुभाष चंद्र बोस ने 1943 में फौज का नेतृत्व सँभाला और 21 अक्तूबर 1943 को सिंगापुर में आज़ाद हिन्द सरकार की घोषणा की; बाद में मुख्यालय रंगून ले जाया गया।
- फौज का वास्तविक युद्ध-क्षेत्र बर्मा था, क्योंकि भारत की ओर बढ़ने का स्थल-मार्ग वहीं से जाता था; 1944 में अराकान तथा इम्फाल-कोहिमा की ओर अभियान चला और उसका नारा 'दिल्ली चलो' था।
- अंदमान-निकोबार द्वीपों पर जापानी अधिकार 1942 में हुआ और दिसंबर 1943 में वे औपचारिक रूप से आज़ाद हिन्द सरकार को सौंपे गए; बोस ने पोर्ट ब्लेयर में तिरंगा फहराया और द्वीपों को शहीद तथा स्वराज नाम दिए।
- 1942 में अरुणाचल प्रदेश नाम का कोई क्षेत्र नहीं था; वह भाग तब उत्तर-पूर्व सीमांत क्षेत्र कहलाता था, 1972 में उसे अरुणाचल प्रदेश नाम के साथ संघ राज्यक्षेत्र बनाया गया और 1987 में पूर्ण राज्य।
- पुस्तिका में राज्य का नाम 'उड़ीसा' छपा है, जो 2011 में हुए पुनर्नामकरण से पहले का सरकारी रूप था; आज वही राज्य ओडिशा कहलाता है।
- अंदमान-निकोबार को युद्ध-मोर्चा मान लेना; वहाँ आज़ाद हिन्द का संबंध प्रशासनिक हस्तांतरण और ध्वजारोहण का था, किसी थल-अभियान का नहीं।
- 1942 की तैनाती को 1944 के अभियान से गड्डमड्ड कर देना; भारत की ओर बढ़ने का प्रयास बाद में हुआ और उससे पहले फौज दक्षिण-पूर्व एशिया में ही थी।
- उस समय अस्तित्व में न रहे नाम को विकल्प मान लेना; 1942 में अरुणाचल प्रदेश नाम का कोई क्षेत्र नहीं था और यह जाँच अकेले ही उस विकल्प को काट देती है।
- अपरिचित व्यक्ति-नाम देखकर प्रश्न छोड़ देना, जबकि उत्तर संगठन के भूगोल और कालक्रम से निकल आता है।
स्वतंत्रता संग्राम से जुड़े प्रश्न इस परीक्षा में दो रूपों में आते हैं। पहला रूप परिचित है — कोई प्रसिद्ध आंदोलन, अधिवेशन, अधिनियम या व्यक्ति, जिसका उत्तर सीधे स्मरण से मिल जाता है। दूसरा रूप यही है, जिसमें किसी कम चर्चित सेनानी का नाम लेकर एक बड़ी घटना का ब्योरा पूछा जाता है; यहाँ प्रश्न स्वयं जीवन-वृत्त का सार दे देता है और अभ्यर्थी से केवल यह अपेक्षा करता है कि वह उस ब्योरे को सही ऐतिहासिक ढाँचे में रखकर पढ़े। ऐसे प्रश्नों की तैयारी व्यक्ति-सूचियाँ रटकर नहीं होती, बल्कि प्रमुख संगठनों का काल और भूगोल याद रखने से होती है — कौन-सा संगठन कब बना, कहाँ सक्रिय था, और उसका मुख्यालय कहाँ रहा। यही ढाँचा आज़ाद हिन्द फौज, ग़दर पार्टी, हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन और अनुशीलन समिति जैसे विषयों पर बने अधिकांश प्रश्नों को हल कर देता है।
इस प्रश्न से सीधे संबंधित कोई पूर्व PYQ उपलब्ध नहीं।
- practice — not a real PYQ
सुभाष चंद्र बोस ने आज़ाद हिन्द सरकार की घोषणा 21 अक्तूबर 1943 को कहाँ की थी?
- (a)सिंगापुर
- (b)रंगून
- (c)टोक्यो
- (d)बैंकॉक
उत्तर(a) सिंगापुर — वहीं से अस्थायी आज़ाद हिन्द सरकार की घोषणा हुई। बाद में 1944 के आरंभ में फौज का मुख्यालय रंगून ले जाया गया, और बैंकॉक में इंडियन इंडिपेंडेंस लीग का सम्मेलन 1942 में हुआ था।
- practice — not a real PYQ
आज़ाद हिन्द फौज ने 1944 में भारत की मुख्य भूमि पर पहली बार तिरंगा किस स्थान पर फहराया था?
- (a)मोइरांग
- (b)कोहिमा
- (c)इम्फाल
- (d)पोर्ट ब्लेयर
उत्तर(a) मोइरांग — मणिपुर के इसी स्थान पर 1944 में ध्वजारोहण हुआ। पोर्ट ब्लेयर में ध्वजारोहण दिसंबर 1943 में हुआ था, किन्तु वह द्वीप-समूह है, मुख्य भूमि नहीं; इम्फाल और कोहिमा पर अभियान चला अवश्य, पर वे अधिकृत नहीं हुए।