निम्नलिखित में से कौन-सा एक पहलू लेखापरीक्षा में निहित नहीं है?
- (a)लेखांकन प्रणाली और आंतरिक नियंत्रण की परीक्षा
- (b)लेखा-बहियों को बनाना
- (c)उपयुक्त व्यक्ति/निकाय को रिपोर्ट करना
- (d)लेनदेन की प्रामाणिकता और वैधता का सत्यापन
सही उत्तर — B, (b) लेखा-बहियों को बनाना — यही एकमात्र पहलू है जो लेखापरीक्षा का काम नहीं, लेखांकन का काम है। पहले पूछ पर ठहरिए। प्रश्न नकारात्मक है और पुस्तिका में 'नहीं' मोटे अक्षरों में छपा है, इसलिए खोजना उस एक विकल्प को है जो लेखापरीक्षा के दायरे से बाहर पड़ता है, न कि उसे जो सबसे महत्त्वपूर्ण लगे। दोनों कामों की सीमा-रेखा एक वाक्य में है : लेखांकन जहाँ समाप्त होता है, लेखापरीक्षा वहाँ आरंभ होती है। बहियाँ बनाना, प्रविष्टियाँ करना, खाताबही में चढ़ाना और वित्तीय विवरण तैयार करना — यह सब लेखाकार का और अंततः प्रबंधन का उत्तरदायित्व है। लेखापरीक्षक का काम उन तैयार बहियों और विवरणों की स्वतंत्र जाँच करके यह राय देना है कि वे सही और उचित चित्र प्रस्तुत करते हैं या नहीं। यह केवल परिभाषा की बात नहीं, स्वतंत्रता की बात है। यदि वही व्यक्ति बहियाँ भी बनाए और फिर उनकी परीक्षा भी करे, तो वह अपने ही काम की जाँच कर रहा होगा और उसकी राय का कोई मूल्य नहीं रह जाएगा — इसे स्व-समीक्षा का ख़तरा कहा जाता है। इसी कारण कंपनी अधिनियम, 2013 की धारा 144 लेखापरीक्षक को कंपनी के लिए कुछ सेवाएँ देने से स्पष्ट रूप से रोकती है, और उस सूची में सबसे पहला नाम लेखांकन तथा लेखा-बही रखने की सेवाओं का ही है। साथ में आंतरिक लेखापरीक्षा, वित्तीय सूचना प्रणाली की रचना और स्थापना, बीमांकिक सेवाएँ, निवेश परामर्श, निवेश बैंकिंग तथा प्रबंधन सेवाएँ भी वर्जित हैं। शेष तीनों विकल्प लेखापरीक्षा के भीतर के काम हैं — लेखांकन प्रणाली और आंतरिक नियंत्रण की परीक्षा, लेनदेन की प्रामाणिकता और वैधता का सत्यापन, तथा उपयुक्त व्यक्ति या निकाय को रिपोर्ट देना — इसलिए वे इस नकारात्मक पूछ के उत्तर नहीं बन सकते।
- (a)लेखांकन प्रणाली और आंतरिक नियंत्रण की परीक्षा — यह लेखापरीक्षा का आरंभिक और सबसे नियोजनात्मक हिस्सा है, इसलिए दायरे से बाहर होने का प्रश्न ही नहीं उठता। लेखापरीक्षक को लेखापरीक्षा से संबंधित आंतरिक नियंत्रण की समझ बनानी होती है, ताकि वह पहचान सके कि किन क्षेत्रों में महत्त्वपूर्ण मिथ्याकथन का जोखिम अधिक है और अपने परीक्षण वहीं केंद्रित कर सके। इसका सीधा व्यावहारिक परिणाम भी है : यदि आंतरिक नियंत्रण मज़बूत है तो लेखापरीक्षक नमूने छोटे रख सकता है, और यदि कमज़ोर है तो उसे विस्तृत सारभूत परीक्षण करने पड़ते हैं। ध्यान दीजिए कि नियंत्रण की परीक्षा करना और नियंत्रण प्रणाली की रचना करना दो अलग बातें हैं — पहली लेखापरीक्षा के भीतर है, दूसरी धारा 144 के अधीन वर्जित सेवाओं में आती है। यही सूक्ष्म भेद इस विकल्प को सही दिखने के बावजूद उत्तर बनने से रोकता है।
- (c)उपयुक्त व्यक्ति/निकाय को रिपोर्ट करना — रिपोर्ट देना लेखापरीक्षा का अंतिम चरण है और उसके बिना पूरी कवायद निरर्थक हो जाती है — लेखापरीक्षक का उत्पाद उसकी राय ही है, और वह राय रिपोर्ट के रूप में ही सामने आती है। कंपनी की सांविधिक लेखापरीक्षा में लेखापरीक्षक की रिपोर्ट कंपनी के सदस्यों को संबोधित होती है, प्रबंधन को नहीं, और यही उसे प्रबंधन से स्वतंत्र बनाता है। दूसरे प्रकार की लेखापरीक्षाओं में प्राप्तकर्ता बदल जाता है : आंतरिक लेखापरीक्षक निदेशक मंडल या लेखापरीक्षा समिति को रिपोर्ट करता है, और सरकारी लेखापरीक्षा नियंत्रक-महालेखापरीक्षक के माध्यम से विधानमंडल तक पहुँचती है। इसी कारण 'उपयुक्त व्यक्ति/निकाय' जैसा लचीला वाक्यांश प्रयोग किया गया है। यह विकल्प लेखापरीक्षा के भीतर है, बाहर नहीं।
- (d)लेनदेन की प्रामाणिकता और वैधता का सत्यापन — यह तो लेखापरीक्षा का मूल शरीर है। प्रविष्टियों को प्रमाणकों, बिलों, रसीदों और अनुबंधों से मिलाना — जिसे प्रमाणन या vouching कहते हैं — तथा परिसंपत्तियों और देयताओं के अस्तित्व, स्वामित्व और मूल्यांकन की जाँच करना — जिसे सत्यापन या verification कहते हैं — इन्हीं दो कामों से लेखापरीक्षक साक्ष्य जुटाता है। 'प्रामाणिकता' का अर्थ है कि लेनदेन वास्तव में हुआ और उसका प्रमाण मौजूद है; 'वैधता' का अर्थ है कि वह कंपनी के अधिकार-क्षेत्र और नियमों के भीतर था। दूसरी बात भी दर्ज कर लीजिए : इसी काम के कारण लेखापरीक्षा वहाँ पहुँच जाती है जहाँ शेष-परीक्षण नहीं पहुँच सकता, क्योंकि शेष-परीक्षण केवल अंकगणितीय संतुलन देखता है और पूर्ण लोप या सिद्धांत-त्रुटि उसमें छिपी रह जाती है। इसलिए यह विकल्प लेखापरीक्षा से बाहर नहीं, उसके केंद्र में है।
लेखांकन और लेखापरीक्षा के बीच की रेखा इस प्रश्न का पूरा विषय है। लेखांकन एक रचनात्मक कार्य है : लेनदेन दर्ज करना, वर्गीकृत करना, संक्षेपित करना और वित्तीय विवरण तैयार करना। लेखापरीक्षा एक समीक्षात्मक कार्य है : उन तैयार विवरणों की स्वतंत्र और वस्तुनिष्ठ जाँच करके यह राय देना कि वे सही और उचित चित्र देते हैं या नहीं। इसीलिए कहा जाता है कि लेखांकन जहाँ समाप्त होता है, लेखापरीक्षा वहाँ आरंभ होती है। लेखापरीक्षा के कार्य को चार चरणों में देखिए तो पूरा प्रश्न खुल जाता है — नियोजन, जिसमें समग्र रणनीति और विस्तृत योजना बनती है; आंतरिक नियंत्रण की समझ और उसका परीक्षण; साक्ष्य जुटाना, अर्थात् प्रमाणन और सत्यापन; और अंत में रिपोर्ट देना। इस प्रश्न के चारों विकल्पों में तीन इन्हीं चरणों के नाम हैं और चौथा — बहियाँ बनाना — इस पूरी शृंखला से पहले की चीज़ है, इसलिए वही बाहर पड़ता है। इसका आधार वह मूल मान्यता है जिस पर लेखापरीक्षा की जाती है : वित्तीय विवरण तैयार करने का उत्तरदायित्व प्रबंधन का है, और लेखापरीक्षक का उत्तरदायित्व केवल उन पर राय देना है।
व्यावहारिक दृष्टि से यह भेद स्वतंत्रता की रक्षा का उपकरण है। कंपनी अधिनियम, 2013 की धारा 144 उन सेवाओं की सूची देती है जो कोई लेखापरीक्षक अपनी लेखापरीक्षित कंपनी को, उसकी होल्डिंग कंपनी को या उसकी सहायक कंपनी को नहीं दे सकता, और उसमें लेखांकन तथा लेखा-बही रखने की सेवाएँ, आंतरिक लेखापरीक्षा, वित्तीय सूचना प्रणाली की रचना और स्थापना, बीमांकिक सेवाएँ, निवेश परामर्श, निवेश बैंकिंग, बाह्यस्रोत से दी जाने वाली वित्तीय सेवाएँ तथा प्रबंधन सेवाएँ शामिल हैं। लेखापरीक्षक की शक्तियाँ और कर्तव्य धारा 143 में हैं — बहियों तक हर समय पहुँच का अधिकार, अधिकारियों से जानकारी माँगने का अधिकार, और सदस्यों को रिपोर्ट देने का कर्तव्य। छोटी इकाइयों में अक्सर एक ही व्यक्ति से दोनों काम करा लिए जाते हैं, और यही वह व्यवहार है जिसे विधि रोकती है। भाषा की एक बात भी दर्ज कर लीजिए : हिन्दी स्तंभ 'लेखापरीक्षा में निहित नहीं है' लिखता है, जबकि अंग्रेज़ी स्तंभ 'not covered in audit' कहता है। साधारण हिन्दी में 'निहित' का अर्थ अंतर्निहित या अंतर्भूत होता है, इसलिए हिन्दी वाक्य अंग्रेज़ी से थोड़ा ढीला बैठता है; अर्थ और उत्तर दोनों वही रहते हैं।
- लेखांकन जहाँ समाप्त होता है, लेखापरीक्षा वहाँ आरंभ होती है — बहियाँ बनाना लेखाकार का काम है, लेखापरीक्षक का नहीं।
- वित्तीय विवरण तैयार करने का उत्तरदायित्व प्रबंधन का होता है; लेखापरीक्षक का उत्तरदायित्व उन पर स्वतंत्र राय देना है।
- यदि लेखापरीक्षक स्वयं बहियाँ बनाए तो वह अपने ही काम की जाँच करेगा — यह स्व-समीक्षा का ख़तरा है और स्वतंत्रता को नष्ट कर देता है।
- कंपनी अधिनियम, 2013 की धारा 144 लेखापरीक्षक के लिए कुछ सेवाएँ वर्जित करती है, जिनमें लेखांकन और लेखा-बही रखने की सेवाएँ, आंतरिक लेखापरीक्षा, वित्तीय सूचना प्रणाली की रचना, बीमांकिक सेवाएँ, निवेश परामर्श, निवेश बैंकिंग तथा प्रबंधन सेवाएँ शामिल हैं।
- लेखापरीक्षक की शक्तियाँ और कर्तव्य कंपनी अधिनियम, 2013 की धारा 143 में हैं, और सांविधिक लेखापरीक्षक की रिपोर्ट कंपनी के सदस्यों को संबोधित होती है।
- लेखापरीक्षा के चार चरण : नियोजन, आंतरिक नियंत्रण की समझ और परीक्षण, साक्ष्य जुटाना (प्रमाणन और सत्यापन), तथा रिपोर्ट देना।
- आंतरिक नियंत्रण की परीक्षा करना लेखापरीक्षा के भीतर है, पर आंतरिक नियंत्रण प्रणाली की रचना करना धारा 144 के अधीन वर्जित सेवा है।
- पुस्तिका में स्टेम का 'नहीं' मोटे अक्षरों में छपा है — पूछ नकारात्मक है।
- नकारात्मक पूछ पढ़कर भी सबसे महत्त्वपूर्ण दिखने वाला विकल्प चुन लेना; पुस्तिका में 'नहीं' मोटे अक्षरों में छपा है और वही खोज की दिशा तय करता है।
- आंतरिक नियंत्रण की परीक्षा और आंतरिक नियंत्रण प्रणाली की रचना को एक मान लेना; पहली लेखापरीक्षा है, दूसरी वर्जित सेवा।
- यह मान लेना कि छोटे व्यवसाय में लेखापरीक्षक बहियाँ भी बना सकता है; व्यवहार में ऐसा होता है, पर विधि उसे रोकती है और परीक्षा विधि पूछती है।
- रिपोर्ट देने को औपचारिकता मान लेना; लेखापरीक्षक का उत्पाद ही उसकी रिपोर्ट है।
- 'निहित' शब्द पढ़कर वाक्य का अर्थ बदल लेना; अंग्रेज़ी स्तंभ में यही बात 'covered in audit' से कही गई है।
इस विषय से प्रश्न चार ढंग से आते हैं। पहला यही — चार काम गिनाकर पूछना कि कौन-सा लेखापरीक्षा का काम नहीं है, जहाँ बहियाँ बनाना, वित्तीय विवरण तैयार करना या कर विवरणी भरना जैसे विकल्प बाहर वाले होते हैं। दूसरा भेद पूछने का है : लेखांकन और लेखापरीक्षा, या लेखापरीक्षा और अन्वेषण, या आंतरिक और सांविधिक लेखापरीक्षा का अंतर। तीसरा धारा-आधारित है : किस धारा में नियुक्ति है, किसमें अनर्हताएँ, किसमें वर्जित सेवाएँ और किसमें शक्तियाँ तथा कर्तव्य — यहाँ 139, 141, 143 और 144 की चौकड़ी बार-बार लौटती है। चौथा स्वतंत्रता पर है : कोई परिस्थिति देकर पूछना कि लेखापरीक्षक की स्वतंत्रता पर कौन-सा ख़तरा उत्पन्न हुआ। चारों के लिए एक ही तैयारी काफ़ी है — लेखापरीक्षा के चरणों की एक सूची और वर्जित सेवाओं की एक सूची, दोनों साथ-साथ याद रखिए।
इस प्रश्न से सीधे संबंधित कोई पूर्व PYQ उपलब्ध नहीं।
- practice — not a real PYQ
कंपनी अधिनियम, 2013 की कौन-सी धारा लेखापरीक्षक को अपनी लेखापरीक्षित कंपनी के लिए लेखांकन और लेखा-बही रखने जैसी कुछ सेवाएँ देने से रोकती है?
- (a)धारा 139
- (b)धारा 141
- (c)धारा 143
- (d)धारा 144
उत्तर(d) धारा 144
- practice — not a real PYQ
किसी कंपनी के वित्तीय विवरण तैयार करने का उत्तरदायित्व किसका होता है?
- (a)सांविधिक लेखापरीक्षक का
- (b)कंपनी के प्रबंधन का
- (c)आंतरिक लेखापरीक्षक का
- (d)लागत लेखापरीक्षक का
उत्तर(b) कंपनी के प्रबंधन का