2019 – 20 में बिहार के GSDP में किसका 60.2 प्रतिशत हिस्सा था ?
- (a)औद्योगिक क्षेत्र
- (b)कृषि क्षेत्र
- (c)विनिर्माण क्षेत्र
- (d)सेवा क्षेत्र
सही — (d) सेवा क्षेत्र। बिहार की अर्थव्यवस्था का केवल एक ही क्षेत्र कभी राज्य के उत्पादन के तीन-पाँचवें के आसपास रहा है, और वह तृतीयक क्षेत्र है। बिहार आर्थिक सर्वेक्षण अपने आरम्भिक अध्याय की तालिका 1.4 में स्थिर 2011-12 क़ीमतों पर सकल राज्य मूल्य वर्धित के क्षेत्रवार हिस्से छापता है, और उसके 2024-25 संस्करण में वही तालिका 2019-20 के लिए तृतीयक हिस्सा 60.9 प्रतिशत बताती है, जबकि उसी शृंखला के नवीनतम वर्ष में प्राथमिक क्षेत्र 19.9 प्रतिशत और द्वितीयक क्षेत्र 21.5 प्रतिशत पर है। इससे क्या सिद्ध होता है और क्या नहीं, यह ठीक-ठीक समझ लीजिए: जाँच के लिए उपलब्ध संस्करण 60.9 छापता है, वह 60.2 नहीं जो आयोग ने उद्धृत किया है, क्योंकि सर्वेक्षण हर वर्ष अपनी शृंखला का पुनरीक्षण करता है और किसी एक संस्करण में छपा 2019-20 का आँकड़ा अगले संस्करण तक अपरिवर्तित बचा रहे, यह आवश्यक नहीं। जिस पर कोई विवाद नहीं वह है क्षेत्र, क्योंकि साठ प्रतिशत के आसपास के तृतीयक हिस्से और लगभग बीस पर खड़े उससे अगले बड़े क्षेत्र के बीच की खाई इतनी चौड़ी है कि कोई भी पुनरीक्षण उसे पाट नहीं सकता। संरचना की दृष्टि से बिहार असामान्य रूप से सेवा-प्रधान राज्य अर्थव्यवस्था है — उसका तृतीयक हिस्सा अखिल भारतीय सेवा हिस्से से कई अंक ऊपर चलता है, इसलिए नहीं कि यहाँ की सेवाएँ असाधारण रूप से सबल हैं, बल्कि इसलिए कि यहाँ का उद्योग असाधारण रूप से दुर्बल है, और इसलिए भी कि यहाँ सेवाओं में जो गिना जाता है उसका बड़ा भाग व्यापार, परिवहन, निर्माण-कार्य से जुड़ी गतिविधि और लोक प्रशासन है, न कि उच्च मूल्य वाली आधुनिक सेवाएँ।
- (a)औद्योगिक क्षेत्र — द्वितीयक क्षेत्र समग्र रूप से — खनन, विनिर्माण, विद्युत् और निर्माण — बिहार के सकल राज्य मूल्य वर्धित का लगभग पाँचवाँ भाग है, आर्थिक सर्वेक्षण की शृंखला के नवीनतम वर्ष में 21.5 प्रतिशत। यह प्रश्न में दिए आँकड़े का लगभग एक-तिहाई है और तदनुरूपी अखिल भारतीय उद्योग हिस्से से भी अच्छा-ख़ासा नीचे। बिहार के द्वितीयक क्षेत्र पर कारख़ानों का नहीं, निर्माण-कार्य का प्रभुत्व है, और यही कारण है कि वह औद्योगिक निवेश के साथ नहीं, लोक निर्माण के व्यय के साथ बढ़ता है।
- (b)कृषि क्षेत्र — प्राथमिक क्षेत्र बिहार के सकल राज्य मूल्य वर्धित के लगभग 19.9 प्रतिशत पर खड़ा है — लगभग पाँचवाँ भाग, तीन-पाँचवाँ नहीं। बिहार के प्रश्नपत्र में यही सबसे लुभावना ग़लत उत्तर है, क्योंकि कृषि बिहार के कार्यबल का जितना बड़ा हिस्सा रोज़गार देती है, उत्पादन में उसका योगदान उससे कहीं कम है। रोज़गार के हिस्से और उत्पादन के हिस्से के बीच का यही अन्तर राज्य की अर्थव्यवस्था का सबसे महत्त्वपूर्ण तथ्य है, और यह प्रश्न चुपचाप उसी की परीक्षा ले रहा है।
- (c)विनिर्माण क्षेत्र — विनिर्माण द्वितीयक क्षेत्र का केवल एक घटक है, इसलिए वह उन 21.5 प्रतिशत से अनिवार्यतः छोटा होगा जो पूरा द्वितीयक क्षेत्र देता है — और बिहार में तो वह बहुत बड़े अन्तर से छोटा है, क्योंकि उस क्षेत्र का बड़ा भाग निर्माण-कार्य है। जो स्वयं पाँचवें भाग का एक घटक हो, वह कुल का तीन-पाँचवाँ नहीं हो सकता।
राज्य के उत्पादन को सकल राज्य घरेलू उत्पाद के रूप में मापा जाता है, और उसकी संरचना सकल राज्य मूल्य वर्धित से पढ़ी जाती है, जिसे तीन क्षेत्रों में बाँटा जाता है। प्राथमिक क्षेत्र में कृषि, वानिकी, मत्स्यन और खनन आते हैं। द्वितीयक क्षेत्र में विनिर्माण, विद्युत्, गैस तथा जलापूर्ति, और निर्माण-कार्य आते हैं। तृतीयक क्षेत्र में शेष सब कुछ — व्यापार, होटल, परिवहन, भण्डारण, संचार, वित्तीय सेवाएँ, स्थावर सम्पदा, लोक प्रशासन तथा अन्य सेवाएँ। विकास का शास्त्रीय मार्ग प्राथमिक से द्वितीयक और फिर तृतीयक की ओर जाता है, और भारत ने कुल मिलाकर उसी का अनुसरण किया, जहाँ सेवाओं का हिस्सा 1980-81 के लगभग 38 प्रतिशत से चढ़ते-चढ़ते आज आधे से काफ़ी ऊपर पहुँच गया है। बिहार का मार्ग इससे भिन्न है और उसे रटने के बजाय समझने योग्य है: वह बड़े प्राथमिक हिस्से से बड़े तृतीयक हिस्से की ओर चला गया, जबकि उसका द्वितीयक क्षेत्र कभी उस अनुपात तक बढ़ा ही नहीं, इसलिए उसकी सेवा-प्रधानता जितनी सबल सेवा अर्थव्यवस्था का परिणाम है, उतनी ही दुर्बल औद्योगीकरण का भी। राज्य में उत्पादन देने वाले क्षेत्र और रोज़गार देने वाले क्षेत्र के बीच एक असामान्य दूरी भी है, क्योंकि कृषि कार्यबल के जितने बड़े हिस्से को सँभालती है, उत्पादन में उसका पाँचवाँ भाग उसका संकेत तक नहीं देता।
इस प्रश्न का उत्तर केवल संरचना से निकाला जा सकता है। चार में से तीन विकल्प एक ही कुल के हैं — उद्योग, विनिर्माण और कृषि, तीनों वस्तु-उत्पादक हैं, और भारत के किसी भी राज्य में कोई वस्तु-उत्पादक क्षेत्र उत्पादन के साठ प्रतिशत पर नहीं है। चौथा विकल्प सेवाएँ हैं, जो लगभग हर भारतीय राज्य में सबसे बड़ा एकल क्षेत्र हैं। इसके आगे समावेशन का सम्बन्ध देखिए: विनिर्माण उद्योग के भीतर है, इसलिए दोनों एक साथ सही नहीं हो सकते और जो छोटा है वह सबसे बड़ा नहीं हो सकता। एक बार विकल्प (a) और (c) को एक-दूसरे में समाया हुआ देख लेने पर मैदान आधा रह जाता है। पुनरावृत्ति के लिए बिहार के एक नहीं, तीन आँकड़े थामिए — तृतीयक लगभग साठ प्रतिशत, द्वितीयक लगभग इक्कीस, प्राथमिक लगभग बीस — और उन्हें आर्थिक सर्वेक्षण के स्थिर 2011-12 क़ीमतों पर सकल राज्य मूल्य वर्धित के हिस्सों के रूप में ही उद्धृत कीजिए, क्योंकि वही शीर्ष आँकड़ा प्रचलित क़ीमतों पर या सकल राज्य घरेलू उत्पाद के आधार पर अलग ढंग से बताया जा सकता है। और प्रश्न में आए किसी सटीक दशमलव को हल्की सावधानी से लीजिए: वह जिस क्षेत्र की ओर संकेत करता है, वह सर्वेक्षण के संस्करणों में स्थिर रहता है, दशमलव स्वयं नहीं।
- बिहार आर्थिक सर्वेक्षण, तालिका 1.4 (स्थिर 2011-12 क़ीमतों पर सकल राज्य मूल्य वर्धित के क्षेत्रवार हिस्से): सर्वेक्षण के 2024-25 संस्करण में 2019-20 के लिए तृतीयक क्षेत्र का हिस्सा 60.9 प्रतिशत बताया गया है।
- उसी शृंखला में प्राथमिक क्षेत्र लगभग 19.9 प्रतिशत और द्वितीयक क्षेत्र लगभग 21.5 प्रतिशत पर है — अर्थात् सेवाएँ इन दोनों में से किसी से भी लगभग तीन गुनी हैं।
- विनिर्माण द्वितीयक क्षेत्र का एक घटक है, और वह पूरा क्षेत्र बिहार के सकल राज्य मूल्य वर्धित का लगभग पाँचवाँ भाग है; बिहार में उस क्षेत्र का बड़ा भाग निर्माण-कार्य है।
- बिहार का तृतीयक हिस्सा सकल घरेलू उत्पाद में अखिल भारतीय सेवा हिस्से से कई प्रतिशत अंक ऊपर चलता है, जो असाधारण सेवाओं का नहीं, दुर्बल उद्योग का चिह्न है।
- भारत का अपना तृतीयक हिस्सा 1980 से लगातार चढ़ा है, 1980-81 के लगभग 38 प्रतिशत से आज आधे से अधिक तक — यही प्रवृत्ति बिहार की संरचना में बढ़ा-चढ़ाकर दिखती है।
तीन विकल्प वस्तु-उत्पादक हैं और उनमें से कोई भी प्रश्न में दिए आँकड़े के एक-तिहाई तक नहीं पहुँचता। अन्तिम पंक्ति दिखाती है कि विकल्प (a) और (c) एक साथ जीवित क्यों नहीं रह सकते: एक दूसरे को अपने भीतर समेटे हुए है।
- कृषि इसलिए चुन लेना कि बिहार कृषि-प्रधान राज्य है। कृषि सबसे अधिक लोगों को रोज़गार देती है, पर उत्पादन का लगभग पाँचवाँ भाग देती है; सेवाएँ लगभग तीन-पाँचवाँ देती हैं।
- उद्योग और विनिर्माण को दो विकल्प मान लेना। विनिर्माण औद्योगिक क्षेत्र का एक घटक है, इसलिए वह दोनों में छोटा ही होगा — और समाई हुई जोड़ी में दोनों कभी सही नहीं हो सकते।
- किसी सटीक दशमलव को स्थिर मान लेना। आर्थिक सर्वेक्षण हर वर्ष अपनी शृंखला का पुनरीक्षण करता है, इसलिए किसी बीते वर्ष का ठीक आँकड़ा संस्करणों के बीच बदलता रहता है, यद्यपि क्षेत्र नहीं बदलता।
BPSC बिहार की अर्थव्यवस्था को आर्थिक सर्वेक्षण से उठाए गए एक आँकड़े के रास्ते पूछता है और अभ्यर्थी से चाहता है कि वह उसे सही क्षेत्र या सही वर्ष से जोड़ दे — और वही माँग वह भारत के राष्ट्रीय लेखों से भी करता है, जैसा दिसम्बर 2024 के 70वीं CCE के प्रश्नपत्र ने किया था, जो 4 जनवरी 2025 की इस पुनर्परीक्षा से भिन्न प्रश्नपत्र है, जब उसने राष्ट्रीय सकल मूल्य वर्धित में कृषि, उद्योग और सेवाओं के हिस्से पूछे। UPSC इसके बजाय दिशा और संरचना पूछता है: तृतीयक हिस्सा बढ़ रहा है या नहीं, या क्षेत्रों का आपसी क्रम क्या है।
1980 से भारत के कुल सकल घरेलू उत्पाद में तृतीयक क्षेत्र के हिस्से ने
- (a) बढ़ती हुई प्रवृत्ति दिखाई है
- (b) घटती हुई प्रवृत्ति दिखाई है
- (c) स्थिर बना रहा है
- (d) उतार-चढ़ाव दिखाया है
उत्तर(a) बढ़ती हुई प्रवृत्ति दिखाई है
यही तथ्य राष्ट्रीय स्तर पर, आँकड़े के रूप में नहीं दिशा के रूप में पूछा गया। भारत का सेवा हिस्सा 1980 से चढ़ता आया है; बिहार उसी प्रवृत्ति के दूर वाले छोर पर बैठा है, जहाँ उसका तृतीयक हिस्सा राष्ट्रीय हिस्से से ऊपर है क्योंकि उसका उद्योग उस अनुपात में कभी फैला ही नहीं।
भारतीय अर्थव्यवस्था के सन्दर्भ में, निम्नलिखित गतिविधियों पर विचार कीजिए : 1. कृषि, वानिकी तथा मत्स्यन 2. विनिर्माण 3. व्यापार, होटल, परिवहन तथा संचार 4. वित्तपोषण, बीमा, स्थावर सम्पदा तथा व्यावसायिक सेवाएँ स्थिर क़ीमतों (2000-01) पर साधन लागत पर सकल घरेलू उत्पाद (GDP) में इन क्षेत्रों के योगदान का घटता हुआ क्रम है
- (a) 3, 1, 2, 4
- (b) 1, 3, 4, 2
- (c) 3, 4, 1, 2
- (d) 1, 3, 2, 4
उत्तर(c) 3, 4, 1, 2
यह उन्हीं क्षेत्रों को एक-दूसरे के सामने क्रम में रखता है और सेवाओं के दो समूहों को कृषि तथा विनिर्माण से ऊपर बिठा देता है — यही वह संरचनात्मक ढाँचा है जिसके कारण किसी राज्य की अर्थव्यवस्था में साठ प्रतिशत का हिस्सा सेवाओं का ही हो सकता है, और किसी का नहीं।
आर्थिक सर्वेक्षण 2023-24 के अनुसार वित्तीय वर्ष 2024 में प्रचलित क़ीमतों पर समग्र GVA में कृषि, उद्योग तथा सेवा क्षेत्रों के हिस्से क्या थे ?
- (a) 18.7%, 28.6% तथा 52.7%
- (b) 17.7%, 27.6% तथा 54.7%
- (c) 16.7%, 26.6% तथा 56.7%
- (d) 17.7%, 28.6% तथा 53.7%
उत्तर(b) 17.7%, 27.6% तथा 54.7%
दिसम्बर 2024 के 70वीं CCE के प्रश्नपत्र ने — जो 4 जनवरी 2025 की इस पुनर्परीक्षा से भिन्न प्रश्नपत्र है — इसी प्रश्न का राष्ट्रीय समकक्ष सीधे संघीय आर्थिक सर्वेक्षण से पूछा था। दोनों को साथ रखिए और बिहार का अलगाव तुरन्त दिख जाता है: उसका सेवा हिस्सा भारत के 54.7 प्रतिशत से कई अंक ऊपर चलता है, जबकि उसका उद्योग हिस्सा 27.6 प्रतिशत से कई अंक नीचे।
- अभ्यास प्रश्न — वास्तविक PYQ नहीं
बिहार के सकल राज्य मूल्य वर्धित में सबसे छोटे हिस्से वाला क्षेत्र है
- (a)तृतीयक क्षेत्र
- (b)प्राथमिक क्षेत्र
- (c)द्वितीयक क्षेत्र
- (d)तीनों लगभग बराबर हैं
उत्तर(b) प्राथमिक क्षेत्र — लगभग 19.9 प्रतिशत, जो द्वितीयक क्षेत्र के 21.5 प्रतिशत से थोड़ा ही नीचे है, जबकि तृतीयक क्षेत्र लगभग 60 प्रतिशत पर दोनों पर भारी पड़ता है।
- अभ्यास प्रश्न — वास्तविक PYQ नहीं
राष्ट्रीय लेखांकन में निम्नलिखित में से कौन द्वितीयक क्षेत्र में आता है ?
- (a)व्यापार, होटल तथा परिवहन
- (b)निर्माण-कार्य
- (c)वानिकी तथा मत्स्यन
- (d)बैंकिंग तथा बीमा
उत्तर(b) निर्माण-कार्य — इसे विनिर्माण, विद्युत्, गैस तथा जलापूर्ति के साथ द्वितीयक क्षेत्र में रखा जाता है। व्यापार, परिवहन, बैंकिंग और बीमा तृतीयक हैं; वानिकी और मत्स्यन प्राथमिक हैं।