दिल्ली सल्तनत के दौरान 'मुकद्दम' पद का इस्तमाल किनके लिए किया जाता था ?
- (a)राजस्व अधिकारी
- (b)गाँव के सरपंच
- (c)गाँव के लेखाकार
- (d)उपर्युक्त में से कोई नहीं
सही — (b) गाँव के सरपंच। खुत, मुकद्दम और चौधरी — ये तीनों उन वंशानुगत ग्रामीण प्रतिष्ठित व्यक्तियों के नाम हैं जो सल्तनत और किसान के बीच खड़े थे, और हर मानक विवरण में मुकद्दम की व्याख्या गाँव के मुखिया के रूप में की जाती है, जबकि चौधरी परगना यानी गाँवों के समूह पर उसी तरह का प्रमुख होता था। ध्यान रहे कि इस प्रश्न का हिन्दी स्तम्भ केवल 'मुकद्दम' पद पूछता है, जबकि अंग्रेज़ी संस्करण में यही प्रश्न 'Muqaddam or Chaudhuri' छापकर दोनों नाम साथ देता है; उत्तर दोनों स्थितियों में एक ही रहता है, क्योंकि दोनों पद इसी मुखिया-वर्ग के हैं। ये लोग सुल्तान द्वारा नियुक्त नहीं होते थे और न ही उससे वेतन पाते थे; ये स्थानीय प्रतिष्ठा वाले लोग थे जो राज्य की ओर से कृषकों से भू-राजस्व वसूलते थे और इस काम के बदले प्रथानुसार एक हिस्सा अपने पास रखते थे। अभिलेखों में इनकी प्रमुखता का कारण वह है जो अलाउद्दीन ख़लजी ने इनके साथ किया। उसके शासनकाल के विवरण के अनुसार तत्कालीन ग्रामीण क्षेत्र और कृषि उत्पादन 'गाँव के मुखियाओं, अर्थात् परम्परागत हिन्दू सत्ताधारियों' के नियन्त्रण में था, जिनके प्रतिरोध को वह अपने शासन की सबसे बड़ी कठिनाई मानता था, और उसकी अपनी शिकायत उद्धृत है कि 'सरदार और मुकद्दम विलासी जीवन जीते हैं पर एक जीतल भी कर नहीं देते।' उसका उत्तर था — उपज का 50 प्रतिशत ख़राज लगाना, जो उस समय प्रभावी हनफ़ी विचारधारा की अधिकतम अनुमत सीमा थी; भूमि के क्षेत्रफल के अनुपात में कर का निर्धारण, ताकि बड़े गाँव अधिक दें; ग्रामीण सरदारों को भी वही दरें चुकाने पर बाध्य करना; वसूली के बदले उनके द्वारा ली जाने वाली कटौती समाप्त करना; और उनसे धन, घोड़े तथा हथियार छीन लेना। ये सारी बातें केवल तभी अर्थ रखती हैं जब सामने वाले लोग वंशानुगत स्थानीय आधार वाले गाँव-मुखिया हों — और विकल्प (b) ठीक यही कहता है।
- (a)राजस्व अधिकारी — इतना निकट कि ख़तरनाक है, और ठीक उसी बिन्दु पर ग़लत जो मायने रखता है। राजस्व अधिकारी राज्य का सेवक होता था — आमिल, मुतसर्रिफ़, कारकुन — जो नियुक्त, वेतनभोगी और स्थानान्तरणीय था। मुकद्दम और चौधरी इसके ठीक उलट थे: गाँव में अपनी स्वयं की प्रतिष्ठा रखने वाले वंशानुगत स्थानीय प्रतिष्ठित लोग, जो राज्य की ओर से राजस्व वसूलते और उसमें से एक हिस्सा रखते थे — यही कारण है कि अलाउद्दीन को उन्हें केवल पदच्युत करने के बजाय उनकी शक्ति तोड़नी पड़ी।
- (c)गाँव के लेखाकार — उस पद का अपना सुपरिचित नाम है — पटवारी, जो गाँव के भूमि-अभिलेख और हिसाब रखता था और सल्तनत से मुग़ल तथा ब्रिटिश राजस्व व्यवस्थाओं में और आज की ज़िला व्यवस्था तक चला आया। जब लेखाकार का पद पहले से ही किसी दूसरे शब्द के नाम है, तो वही अर्थ मुकद्दम का भी नहीं हो सकता।
- (d)उपर्युक्त में से कोई नहीं — बचाव-विकल्प तभी उपलब्ध होता है जब तीनों नामित अर्थ विफल हो जाएँ, जबकि दूसरा अर्थ सल्तनतकालीन ग्रामीण प्रशासन के हर विवरण में मिलने वाली मानक व्याख्या है। इसका उलटा अनुशासन भी देखिए: जो अभ्यर्थी 'मुखिया' शब्द को अपर्याप्त मानकर (b) को छोड़ता है, उसे फिर भी यह दिखाना होगा कि शेष दोनों भी नहीं बैठते — और वे दोनों तो पहले से ही दूसरे पदों के नाम हैं।
सल्तनत के प्रशासन में दो परतें थीं, जिन्हें आपस में गड्डमड्ड कर देना आसान है। ऊपरी परत इक़्ता व्यवस्था थी: विजित क्षेत्र सैन्य सेनानायकों — इक़्तादारों या मुक़्तियों — में बाँट दिया जाता था, जो अपने क्षेत्र का राजस्व वसूलते, उसी से सेना रखते और शेष बची राशि — फ़वाज़िल — शाही कोष में भेजते थे। यह परत तुर्की थी, राजकीय थी, और सुल्तान की इच्छा से स्थानान्तरणीय थी। निचली परत गाँव थी, और वह तुर्की बिलकुल नहीं थी। वहाँ वही लोग चलते रहे जो विजय से पहले भी ग्रामीण समाज चलाते थे: गाँव और परगना स्तर पर मुखिया के रूप में खुत, मुकद्दम और चौधरी; लेखाकार के रूप में पटवारी; तथा गाँव के कारीगर और पंचायत। सल्तनत किसान तक केवल इन्हीं बिचौलियों के माध्यम से पहुँचती थी, जिससे उन्हें शक्ति भी मिली और राजस्व में प्रथागत हिस्सा भी। इन दो परतों के बीच का तनाव ही सल्तनतकालीन कृषि नीति की कहानी है, और अलाउद्दीन ख़लजी के उपाय — कृषकों से सीधे ख़राज की वसूली, गंगा-यमुना दोआब में इक़्ता तथा अनुदानों की समाप्ति, बिचौलियों की कटौती का अन्त — उसका सबसे तीखा प्रसंग हैं। जिस भू-कर को उसने व्यवस्थित किया, ख़राज या माल, उसे कैम्ब्रिज इकोनॉमिक हिस्ट्री ऑफ़ इंडिया उसके शासन की सबसे लम्बे समय तक टिकने वाली संस्था बताती है, जो उन्नीसवीं या यहाँ तक कि बीसवीं शताब्दी तक चली।
प्रश्न के भीतर के संकेत ही अधिकांश काम कर देते हैं। पहला, विकल्पों में शेष हर अर्थ पहले से ही किसी दूसरे फ़ारसी-अरबी शब्द का है, जो आपको आना चाहिए: वेतनभोगी राजस्व अधिकारी आमिल है, लेखाकार पटवारी है। जब किसी विकल्प का अर्थ ऐसे शब्द से जुड़ा हो जो प्रश्न में है ही नहीं, तो वह विकल्प भ्रामक है। दूसरा, मुकद्दम को अकेले पूछा जाए या चौधरी के साथ, उत्तर वही श्रेणी रहती है — ऐसी श्रेणी जो गाँव-स्तरीय और परगना-स्तरीय दोनों प्रकार के मुखियाओं को समेट सके; 'गाँव के सरपंच' वह श्रेणी है, जबकि 'गाँव के लेखाकार' एक अकेला नामित पद है और श्रेणी नहीं। इससे बड़ी आदत यह बनानी चाहिए कि सल्तनत की शब्दावली को परिवारों में याद रखा जाए — असाइनमेंट व्यवस्था के लिए इक़्ता, मुक़्ती, फ़वाज़िल और ख़ालिसा; गाँव के लिए खुत, मुकद्दम, चौधरी और पटवारी; करों के लिए ख़राज, घड़ी और चराई — क्योंकि BPSC और UPSC दोनों इन्हें अलग-अलग परिभाषाओं के रूप में पूछते हैं।
- खुत, मुकद्दम और चौधरी दिल्ली सल्तनत के वंशानुगत ग्रामीण बिचौलिये थे — मुकद्दम गाँव का मुखिया और चौधरी परगने पर मुखिया; गाँव का लेखाकार पटवारी था।
- अलाउद्दीन ख़लजी ने उत्तर भारत के बड़े भाग में कृषि उपज पर 50 प्रतिशत की दर से ख़राज लगाया, जो उस समय दिल्ली में प्रभावी हनफ़ी विचारधारा द्वारा अनुमत अधिकतम सीमा थी।
- उसने कर का निर्धारण भूमि के क्षेत्रफल के अनुपात में किया, ताकि अधिक भूमि वाले गाँव अधिक दें; ग्रामीण सरदारों को भी साधारण कृषकों के समान दरों पर कर देने के लिए बाध्य किया, और राजस्व वसूली के बदले उनके द्वारा लिया जाने वाला हिस्सा समाप्त कर दिया।
- उसने गंगा-यमुना दोआब के बड़े भूभाग से इक़्ता, भूमि-अनुदान और सामन्तों को हटाकर उसे सीधे शासित राजकीय भूमि के अधीन लाया, तथा विद्रोह रोकने के लिए ग्रामीण सरदारों से धन, घोड़े और हथियार छीन लिए।
- कैम्ब्रिज इकोनॉमिक हिस्ट्री ऑफ़ इंडिया उसकी कर-व्यवस्था को उसके शासन की सबसे लम्बे समय तक चलने वाली संस्था कहती है, जिसमें ख़राज या माल किसान के अधिशेष को लेने का प्रमुख रूप बन गया।

- 'राजस्व अधिकारी' इसलिए चुन लेना क्योंकि मुकद्दम राजस्व वसूलते थे। वे वंशानुगत ग्रामीण प्रतिष्ठित व्यक्तियों के रूप में, प्रथागत हिस्सा लेकर वसूलते थे, न कि राज्य के नियुक्त, वेतनभोगी सेवक के रूप में — अधिकारी तो आमिल था।
- यह भूल जाना कि गाँव के लेखाकार का अपना नाम पहले से है, पटवारी — यही बात विकल्प (c) को प्रतिस्पर्धी अर्थ नहीं, बल्कि भ्रामक विकल्प बनाती है।
- चौधरी को मुकद्दम के समान मान लेना। दोनों मुखिया हैं, पर चौधरी का क्षेत्राधिकार परगना — गाँवों का समूह — था और मुकद्दम का एक गाँव।
BPSC सल्तनत प्रशासन को सीधी परिभाषा के रूप में पूछता है — पद दीजिए, अर्थ चुनिए — और भ्रामक विकल्प उसी व्यवस्था के आस-पास के पदों से लिए जाते हैं, इसलिए जिस अभ्यर्थी को यह शब्दावली परिवार के रूप में याद है वह तुरन्त उत्तर दे देता है। UPSC भी यही करता है पर अधिक दुर्लभ शब्द उठाता है, जैसे फ़वाज़िल, या इस शब्दावली को राजवंशों के आर-पार सुमेलन में बदल देता है, जिसमें इक़्ता को दिल्ली सुल्तानों के साथ और जागीर, अमरम तथा मोकासा को उनके सामने रखा जाता है।
सल्तनत काल में फ़वाज़िल का अर्थ था
- (a) अमीरों को किया गया अतिरिक्त भुगतान
- (b) वेतन के बदले सौंपा गया राजस्व
- (c) इक़्तादारों द्वारा राजकोष में जमा की गई अधिशेष राशि
- (d) किसानों से वसूली गई अवैध उगाही
उत्तर(c) इक़्तादारों द्वारा राजकोष में जमा की गई अधिशेष राशि
वही अभ्यास, पर व्यवस्था की एक परत ऊपर — सल्तनत के एक राजस्व शब्द को तीन प्रशंसनीय निकट-अर्थों के सामने रखकर परिभाषित करना। फ़वाज़िल इक़्ता परत का है, और मुकद्दम तथा चौधरी उसके नीचे की गाँव-परत के।
सूची I को सूची II से सुमेलित कीजिए तथा सूचियों के नीचे दिए गए कूट का प्रयोग करके सही उत्तर चुनिए : सूची I I. इक़्ता II. जागीर III. अमरम IV. मोकासा सूची II A) मराठा B) दिल्ली सुल्तान C) मुग़ल D) विजयनगर कूट :
- (a) I-C, II-B, III-A, IV-D
- (b) I-B, II-C, III-D, IV-A
- (c) I-B, II-C, III-A, IV-D
- (d) I-C, II-B, III-D, IV-A
उत्तर(b) I-B, II-C, III-D, IV-A
भूमि-असाइनमेंट की शब्दावली को राजवंश के अनुसार छाँटता है, और यही अनुशासन इस प्रश्न को छोटे रूप में चाहिए: हर शब्द एक ही व्यवस्था और एक ही स्तर का है, और इक़्ता की परत को गाँव की परत से मिला देना ही वह तरीका है जिससे यहाँ के भ्रामक विकल्प बने हैं।
- अभ्यास प्रश्न — वास्तविक PYQ नहीं
दिल्ली सल्तनत की राजस्व व्यवस्था में गाँव का लेखाकार कहलाता था
- (a)मुकद्दम
- (b)चौधरी
- (c)पटवारी
- (d)आमिल
उत्तर(c) पटवारी — गाँव के भूमि-अभिलेख और हिसाब रखने वाला। मुकद्दम और चौधरी मुखिया थे, और आमिल राज्य का वेतनभोगी राजस्व अधिकारी था।
- अभ्यास प्रश्न — वास्तविक PYQ नहीं
अलाउद्दीन ख़लजी ने कृषि उपज पर ख़राज निर्धारित किया
- (a)उपज का छठा भाग
- (b)उपज का चौथाई भाग
- (c)उपज का तिहाई भाग
- (d)उपज का आधा भाग
उत्तर(d) उपज का आधा भाग — 50 प्रतिशत, जो उस समय दिल्ली में प्रभावी हनफ़ी विधि-सम्प्रदाय द्वारा अनुमत अधिकतम सीमा थी, और जिसका निर्धारण धारित भूमि के क्षेत्रफल के अनुपात में होता था।