100°C ताप पर वायु में जलने की तुलना में 100°C पर स्थित वाष्प में जलना
- (a)कम वाष्पीकरण की गुप्त उष्मा के कारण कम खतरनाक है
- (b)कम वाष्पीकरण की गुप्त उष्मा के कारण ज्यादा खतरनाक है
- (c)ज्यादा वाष्पीकरण की गुप्त उष्मा के कारण ज्यादा खतरनाक है
- (d)ज्यादा वाष्पीकरण की गुप्त उष्मा के कारण कम खतरनाक है
सही — (c) ज्यादा वाष्पीकरण की गुप्त उष्मा के कारण ज्यादा खतरनाक है। वायु तथा वाष्प, दोनों एक ही ताप पर हैं, इसलिए दोनों को अलग करने वाली चीज़ ताप हो ही नहीं सकती। उन्हें अलग करने वाली चीज़ यह है कि हर एक त्वचा में कितनी ऊर्जा उड़ेल सकता है, और वाष्प अपने साथ एक विशाल अतिरिक्त भण्डार लिए चलती है, जो वायु के पास है ही नहीं। 100 डिग्री सेल्सियस के एक किलोग्राम जल को 100 डिग्री सेल्सियस की ही एक किलोग्राम वाष्प में बदलने के लिए लगभग 22.6 लाख जूल चाहिए — 22.6 × 10^5 जूल प्रति किलोग्राम, अर्थात् मोटे तौर पर 540 कैलोरी प्रति ग्राम — और जितनी देर यह ऊर्जा भीतर जाती है, ताप एक डिग्री भी नहीं बढ़ता। यही वाष्पीकरण की गुप्त ऊष्मा है, और वह बस वाष्प में संचित पड़ी रहती है। जब वाष्प त्वचा को छूती है तो वह वापस जल में संघनित हो जाती है, और उसका एक-एक जूल पल भर में ऊतक में छोड़ दिया जाता है। उसके बाद ही वह बना हुआ जल, जो अब 100 डिग्री पर है, शरीर के ताप की ओर ठण्डा होना आरम्भ करता है और कुछ और साधारण प्रत्यक्ष ऊष्मा देता है — 100 से लगभग 37 डिग्री तक गिरने में लगभग 2.6 लाख जूल प्रति किलोग्राम। अर्थात् वाष्प से हुए जलने की लगभग दस में से नौ भाग हानि गुप्त ऊष्मा से आती है, इससे पहले कि ठण्डा होना शुरू भी हो। गर्म वायु के पास ऐसा कोई भण्डार नहीं है। वह ठण्डी होते हुए केवल प्रत्यक्ष ऊष्मा दे सकती है, उसकी विशिष्ट ऊष्मा धारिता लगभग 1,000 जूल प्रति किलोग्राम प्रति डिग्री है, और इन तापों पर एक किलोग्राम वायु लगभग एक घन मीटर घेरती है — इसलिए 100 डिग्री की वायु त्वचा को वास्तव में जितनी ऊर्जा देती है वह इतनी कम होती है कि व्यक्ति सॉना में खड़ा रह सकता है या गर्म ओवन खोल सकता है और उसे चोट नहीं आती। इसलिए निर्णय है 'ज़्यादा ख़तरनाक', और कारण यह है कि गुप्त ऊष्मा ज़्यादा है, कम नहीं। जल की वाष्पीकरण की गुप्त ऊष्मा वस्तुतः किसी भी सामान्य द्रव की तुलना में सबसे बड़ी में से है, और यही गुण पसीने को शरीर ठण्डा करने का प्रभावी तरीक़ा बनाता है तथा वाष्प को बिजलीघर में ऊर्जा ढोने का किफ़ायती साधन। छपाई के बारे में एक बात : चारों विकल्पों में यह शब्द 'उष्मा' छपा है, मानक 'ऊष्मा' नहीं — यह प्रश्नपत्र की अपनी छपाई है और अर्थ पर कोई असर नहीं डालती।
- (a)कम वाष्पीकरण की गुप्त उष्मा के कारण कम खतरनाक है — दोनों आधे भागों पर ग़लत। वाष्प से जलना अधिक गम्भीर होता है, हल्का नहीं, और जल की वाष्पीकरण की गुप्त ऊष्मा कम नहीं, असाधारण रूप से अधिक है। यह विकल्प केवल उस संसार में सही होता जहाँ संघनित होती वाष्प लगभग कोई ऊर्जा छोड़ती ही न हो — और तब वाष्प तथा गर्म वायु सचमुच बराबर होतीं।
- (b)कम वाष्पीकरण की गुप्त उष्मा के कारण ज्यादा खतरनाक है — यही ख़तरनाक विकल्प है, क्योंकि निर्णय सही है और केवल कारण ग़लत। जिस अभ्यर्थी को अनुभव से पता है कि वाष्प गर्म वायु से कहीं बुरी तरह झुलसाती है, वह पंक्ति के अन्त तक पढ़े बिना इसे स्वीकार कर लेगा। पर कम गुप्त ऊष्मा का अर्थ होता कि वाष्प के पास अतिरिक्त ऊर्जा नाममात्र की है, जो उस निर्णय के लिए आवश्यक व्याख्या का ठीक उल्टा है — ख़तरा है ही इसलिए कि गुप्त ऊष्मा लगभग 22.6 × 10^5 जूल प्रति किलोग्राम है।
- (d)ज्यादा वाष्पीकरण की गुप्त उष्मा के कारण कम खतरनाक है — भौतिकी ठीक पकड़ता है और निष्कर्ष उलट देता है। वाष्पीकरण की गुप्त ऊष्मा सचमुच अधिक है, पर अधिक गुप्त ऊष्मा का अर्थ है कि संघनन पर अधिक ऊर्जा छूटती है, जिससे जलन और बुरी होती है, हल्की नहीं। यह उस अभ्यर्थी का विकल्प है जो सही भौतिक राशि तो पहचान लेता है और फिर उसे ग़लत परिणाम से जोड़ देता है।
किसी पदार्थ को दी गई ऊष्मा दो में से एक काम करती है : या तो ताप बढ़ाती है, या अवस्था बदलती है। पहली प्रकार की ऊर्जा प्रत्यक्ष ऊष्मा है, जो द्रव्यमान गुणा विशिष्ट ऊष्मा धारिता गुणा ताप-परिवर्तन से निकाली जाती है। दूसरी प्रकार की ऊर्जा गुप्त ऊष्मा है, जो स्थिर ताप पर तब अवशोषित या मुक्त होती है जब पदार्थ पिघलता, जमता, उबलता या संघनित होता है, और थर्मामीटर पर वह दिखाई ही नहीं देती — 'गुप्त', अर्थात् छिपी हुई, का यही अर्थ है। जल के लिए ये दोनों गुप्त ऊष्माएँ बड़ी हैं और असमान भी : गलन की गुप्त ऊष्मा, अर्थात् 0 डिग्री पर बर्फ़ से जल, लगभग 3.34 × 10^5 जूल प्रति किलोग्राम है, जबकि वाष्पीकरण की गुप्त ऊष्मा, अर्थात् 100 डिग्री पर जल से वाष्प, लगभग 22.6 × 10^5 जूल प्रति किलोग्राम — लगभग सात गुना। दोनों ही किसी भी सामान्य पदार्थ के सबसे ऊँचे मानों में हैं, और दोनों रोज़मर्रा के तथ्य समझा देती हैं। बर्फ़ किसी पेय को उतने ही द्रव्यमान वाले ठण्डे जल से कहीं अधिक प्रभावी ढंग से ठण्डा करती है, क्योंकि उसे गरम होना शुरू करने से पहले अपनी गलन की गुप्त ऊष्मा अवशोषित करनी पड़ती है। पसीना त्वचा को इसलिए ठण्डा करता है कि वाष्पन गुप्त ऊष्मा साथ ले जाता है। और वाष्प से जलना इसलिए गम्भीर होता है कि संघनन वही गुप्त ऊष्मा वापस ले आता है।
यहाँ विकल्पों का समुच्चय दो-गुणा-दो की जाली है — निर्णय या तो 'ज्यादा खतरनाक' है या 'कम खतरनाक', और कारण या तो 'ज्यादा' गुप्त ऊष्मा है या 'कम' — और चारों संयोजनों में से केवल एक सुसंगत है। यह रचना वरदान है, क्योंकि इसका अर्थ है कि दोनों आधे भाग स्वतन्त्र रूप से तय किए जा सकते हैं और किसी अनुमान को दूसरे पर निर्भर रहने की ज़रूरत नहीं। निर्णय अनुभव तथा भौतिकी, दोनों से तय कीजिए : वाष्प झुलसा देती है, ओवन या सॉना की गर्म वायु नहीं, इसलिए 'ज्यादा खतरनाक'। कारण संख्या से तय कीजिए : 22.6 × 10^5 जूल प्रति किलोग्राम बड़ी राशि है, और वाष्प के संघनित होने पर वह मुक्त होती है, अवशोषित नहीं, इसलिए 'ज्यादा' गुप्त ऊष्मा। दोनों को जोड़ने पर विकल्प (c) मिलता है और शेष तीनों एक साथ कट जाते हैं। सामान्य सीख कह देने योग्य है, क्योंकि प्रश्नपत्र यह रचना लगातार काम में लाते हैं : जब कोई प्रश्न निष्कर्ष तथा कारण, दोनों एक साथ माँगे, तब उन्हें अलग-अलग जाँचिए, और किसी विकल्प को केवल इसलिए कभी मत मानिए कि उसका पहला आधा भाग सही है। यहाँ चार में से दो विकल्प आधे-सही हैं, और उनमें से हर एक उसी अभ्यर्थी के लिए बना है जो परिचित हिस्सा पहचानते ही पढ़ना बन्द कर देता है।
- जल की वाष्पीकरण की गुप्त ऊष्मा लगभग 22.6 × 10^5 जूल प्रति किलोग्राम है, अर्थात् मोटे तौर पर 540 कैलोरी प्रति ग्राम, जो बिना किसी ताप-परिवर्तन के अवशोषित या मुक्त होती है
- 100 °C की वाष्प संघनित होते समय वही गुप्त ऊष्मा त्वचा में छोड़ देती है, और उसके बाद ही 100 °C पर बना जल ठण्डा होते हुए और प्रत्यक्ष ऊष्मा देता है
- 100 °C से शरीर के ताप तक ठण्डा होने में प्रति किलोग्राम जल लगभग 2.6 × 10^5 जूल छोड़ता है, इसलिए वाष्प से हुए जलने की लगभग नौ-दसवीं ऊर्जा गुप्त ऊष्मा से आती है
- वायु की तुलना में स्थिति नगण्य है : उसकी विशिष्ट ऊष्मा धारिता लगभग 1,000 जूल प्रति किलोग्राम प्रति °C है, और इन तापों पर उसका एक किलोग्राम लगभग एक घन मीटर घेरता है
- बर्फ़ की गलन की गुप्त ऊष्मा, लगभग 3.34 × 10^5 जूल प्रति किलोग्राम, वाष्पीकरण की गुप्त ऊष्मा का मोटे तौर पर सातवाँ भाग है — यह भेद UPSC सीधे जाँच चुका है
- यही ऊँची गुप्त ऊष्मा पसीने को कुशल शीतलन-तन्त्र बनाती है और वाष्प को बिजलीघरों का कुशल कार्यकारी द्रव
बराबर ताप का अर्थ बराबर ऊष्मा-सामग्री नहीं है। दोनों के बीच का पूरा अन्तर गुप्त ऊष्मा है, और चूँकि वह संघनन पर मुक्त होती है, इसलिए उसका बड़ा मान जलन को हल्का नहीं, और बुरा बनाता है।
- किसी विकल्प को इसलिए स्वीकार कर लेना कि उसका निर्णय सही है; विकल्प (b) सही निष्कर्ष तक एक झूठे कारण से पहुँचता है
- यह मान लेना कि बराबर ताप का अर्थ बराबर ऊष्मा-सामग्री है — 100 °C की वाष्प में 100 °C के जल से कहीं अधिक ऊर्जा होती है
- दोनों गुप्त ऊष्माओं को गड्डमड्ड कर देना : गलन की लगभग 3.34 × 10^5 जूल प्रति किलोग्राम है और वाष्पीकरण की लगभग 22.6 × 10^5, दोनों एक नहीं
BPSC निष्कर्ष-और-कारण वाला युग्मित विकल्प काम में लाता है, जो यह जाँचने का सघन तरीक़ा है कि अभ्यर्थी किसी तथ्य को केवल दोहरा सकता है या समझा भी सकता है, और वह एक आधा-सही विकल्प ठीक सही उत्तर के ऊपर बिठा देता है। UPSC कथन-सूची पसन्द करता है — यह पूछते हुए कि 100 °C की वाष्प तथा 100 °C का जल बराबर ऊष्मा रखते हैं या नहीं, और जल की दोनों गुप्त ऊष्माएँ बराबर हैं या नहीं — जो वही भेद किसी परिदृश्य के बजाय संख्याओं से जाँचता है।
निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. 100 °C पर वाष्प तथा 100 °C पर खौलते जल में ऊष्मा की मात्रा समान होती है। 2. बर्फ़ की गलन की गुप्त ऊष्मा जल की वाष्पीकरण की गुप्त ऊष्मा के बराबर होती है। 3. वातानुकूलक में कमरे की वायु से ऊष्मा वाष्पित्र कुण्डलियों पर खींची जाती है और संघनित्र कुण्डलियों पर बाहर छोड़ी जाती है। इन कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं ?
- (a) 1 तथा 2
- (b) 2 तथा 3
- (c) केवल 2
- (d) केवल 3
उत्तर(d) केवल 3
कथन 1 ठीक वही तथ्य है जिस पर यह BPSC वाला प्रश्न घूमता है, वहाँ पकड़े जाने के लिए झूठ के रूप में रखा हुआ : 100 °C की वाष्प उसी ताप के जल से कहीं अधिक ऊष्मा रखती है, और वह अन्तर वाष्पीकरण की गुप्त ऊष्मा है।
कथन (A): ऊँचाई बढ़ने के साथ जल का क्वथनांक घटता है। कारण (R): ऊँचाई के साथ वायुमण्डलीय दाब बढ़ता है।
- (a) A तथा R दोनों अलग-अलग सही हैं और R, A की सही व्याख्या है
- (b) A तथा R दोनों अलग-अलग सही हैं परन्तु R, A की सही व्याख्या नहीं है
- (c) A सही है परन्तु R ग़लत है
- (d) A ग़लत है परन्तु R सही है
उत्तर(c) A सही है परन्तु R ग़लत है
वही निष्कर्ष-और-कारण वाली रचना, जो इस BPSC प्रश्न को तय करती है, पर UPSC के कथन–कारण रूप में। यहाँ भी निष्कर्ष सही है और उसके लिए दिया गया कारण ग़लत, और अंक केवल उस अभ्यर्थी को मिलता है जो दोनों आधे भाग अलग-अलग जाँचता है।
निम्नलिखित में से कौन-सी उष्माक्षेपी प्रक्रियाएँ है ? i. पानी का वाष्पीकरण । ii. सल्फ्यूरिक अम्ल (H2SO4) का तनुकरण । iii. बिना बूझे चूने के साथ पानी की प्रतिक्रिया । iv. कपूर (क्रिस्टल) का उर्ध्वपातन ।
- (a) ii और iii
- (b) iii और iv
- (c) i और ii
- (d) i और iv
उत्तर(a) ii और iii
दिसम्बर 2024 में हुआ 70वीं CCE का प्रश्नपत्र — जो यह जनवरी 2025 की पुनर्परीक्षा नहीं, एक अलग प्रश्नपत्र है — वही ऊर्जा का हिसाब दूसरी दिशा से जाँचता है : वाष्पन गुप्त ऊष्मा अवशोषित करता है और ऊष्माशोषी है, और यही कारण है कि उसकी उल्टी प्रक्रिया — त्वचा पर संघनन — उसे मुक्त कर देती है और झुलसा देती है।
- अभ्यास प्रश्न — वास्तविक PYQ नहीं
100 °C पर जल की वाष्पीकरण की गुप्त ऊष्मा लगभग कितनी होती है ?
- (a)3.34 × 10^5 जूल/किग्रा
- (b)4.2 × 10^3 जूल/किग्रा
- (c)22.6 × 10^5 जूल/किग्रा
- (d)1.0 × 10^5 जूल/किग्रा
उत्तर(c) 22.6 × 10^5 जूल/किग्रा — लगभग 540 कैलोरी प्रति ग्राम; 3.34 × 10^5 जूल/किग्रा बर्फ़ की गलन की गुप्त ऊष्मा है, और 4.2 × 10^3 जूल/किग्रा/°C जल की विशिष्ट ऊष्मा धारिता के निकट है।
- अभ्यास प्रश्न — वास्तविक PYQ नहीं
0 °C पर बर्फ़ के पिघलते समय उसे दी गई ऊष्मा
- (a)उसका ताप लगातार बढ़ाती है
- (b)उसकी अवस्था बदलने में काम आती है, बिना ताप बढ़े
- (c)पूरी की पूरी परिवेश में चली जाती है
- (d)केवल पहले से बने जल का ताप बढ़ाती है
उत्तर(b) उसकी अवस्था बदलने में काम आती है, बिना ताप बढ़े — यही गलन की गुप्त ऊष्मा है, जो सारी बर्फ़ पिघल जाने तक स्थिर ताप पर अवशोषित होती रहती है।