जब एक टेलीस्कोप के अभिदृश्यक लेंस का व्यास बढ़ता है तब टेलीस्कोप की विभेदन क्षमता
- (a)बढ़ती है
- (b)घटती है
- (c)लेंस की फोकस दूरी पर निर्भर करती है
- (d)अपरिवर्तित रहती है
सही — (a) बढ़ती है। कोई भी दूरदर्शी किसी तारे का पूर्णतः बिन्दुवत प्रतिबिम्ब नहीं बना सकता, क्योंकि उसके वृत्ताकार द्वारक से गुज़रता प्रकाश विवर्तित होकर एक छोटी चकती में फैल जाता है, जिसके चारों ओर धुँधले वलय होते हैं। दो तारे तभी अलग-अलग पहचाने जा सकते हैं जब उनके विवर्तन प्रतिरूप पर्याप्त दूर हों, और रेले कसौटी उस सीमा को कोणीय पृथक्करण के रूप में रखती है — तरंगदैर्घ्य का 1.22 गुना, द्वारक के व्यास से भाग देने पर; अर्थात् थीटा बराबर 1.22 लैम्ब्डा बटा D। इस व्यंजक का हर पद मायने रखता है। द्वारक D हर में बैठा है, इसलिए अभिदृश्यक जितना बड़ा होगा थीटा उतना छोटा होगा: वह न्यूनतम पृथक्करण घट जाता है जिसे यंत्र अलग कर सकता है, और ठीक इसी को अधिक विभेदन क्षमता कहते हैं। विभेदन क्षमता प्रायः इसे उल्टा लिखकर बताई जाती है, D बटा 1.22 लैम्ब्डा, ताकि वह द्वारक के साथ-साथ बढ़ती दिखे। संख्याएँ रखिए तो प्रभाव मूर्त हो जाता है: 550 नैनोमीटर तरंगदैर्घ्य पर 100 मिलीमीटर के अभिदृश्यक की विवर्तन सीमा लगभग 1.4 चाप-सेकंड होती है, जबकि हबल अंतरिक्ष दूरदर्शी का 2.4 मीटर दर्पण लगभग 0.05 चाप-सेकंड तक पहुँचता है। द्वारक एक दूसरी चीज़ भी देता है, और इसीलिए वेधशालाएँ उसके पीछे भागती हैं: एकत्र होने वाला प्रकाश क्षेत्रफल के अनुपात में होता है, अर्थात् व्यास के वर्ग के अनुपात में, इसलिए D दुगुना करने पर चार गुना प्रकाश मिलता है और अधिक मन्द पिंड तक पहुँच बनती है। इसके विपरीत आवर्धन फोकस दूरियों का मामला है और यंत्र वास्तव में जो अलग कर सकता है उसमें कुछ नहीं जोड़ता।
- (b)घटती है — यह रेले कसौटी को ठीक उल्टा पढ़ना है। यह भूल तब होती है जब परिणाम कहने के दो तरीक़े गड्डमड्ड हो जाएँ — द्वारक बढ़ने पर सीमान्त कोण घटता है, और जिसने केवल 'थीटा छोटा हो जाता है' रट रखा है, बिना यह ध्यान दिए कि छोटा थीटा बेहतर विभेदन का अर्थ है, वह प्रवृत्ति उल्टी पढ़ लेगा।
- (c)लेंस की फोकस दूरी पर निर्भर करती है — सबसे शिक्षाप्रद ग़लत उत्तर, क्योंकि फोकस दूरी सचमुच किसी चीज़ को नियन्त्रित करती है — आवर्धन को, जो अभिदृश्यक की फोकस दूरी और नेत्रिका की फोकस दूरी का अनुपात है। पर धुँधले प्रतिबिम्ब को बड़ा करने से केवल बड़ा धब्बा मिलता है। दूरदर्शी को उसके द्वारक की विभेदन सीमा से आगे खींचने के लिए 'रिक्त आवर्धन' मानक शब्द है, और इसीलिए किसी खिलौना दूरदर्शी के डिब्बे पर छपी बड़ी संख्या का कोई अर्थ नहीं होता।
- (d)अपरिवर्तित रहती है — इसका अर्थ होता कि विभेदन के सूत्र में द्वारक आता ही नहीं, जो सिद्धान्त के भी विरुद्ध है और पिछली दो शताब्दियों में बनी हर वेधशाला के भी। यदि द्वारक से कोई अन्तर न पड़ता, तो भारी लागत पर आठ या दस मीटर चौड़े दर्पण बनाने का कोई कारण ही न होता।
किसी प्रकाशीय यंत्र के तीन अलग-अलग निष्पादन-मान लगातार गड्डमड्ड होते रहते हैं, और इस तरह का प्रश्न वस्तुतः यही परखता है कि आप उन्हें अलग-अलग रखते हैं या नहीं। आवर्धन क्षमता बताती है कि प्रतिबिम्ब कितना बड़ा दिखेगा और वह फोकस दूरियों पर निर्भर है — दूरदर्शी में अभिदृश्यक की फोकस दूरी बटा नेत्रिका की फोकस दूरी। प्रकाश-संग्रहण क्षमता बताती है कि कितना मन्द पिंड पकड़ा जा सकता है और वह द्वारक के व्यास के वर्ग के अनुपात में होती है, क्योंकि मायने संग्रहण-क्षेत्रफल रखता है। विभेदन क्षमता बताती है कि दो पिंड कितने पास होकर भी दो दिखते रहेंगे, और उसे द्वारक पर होने वाला विवर्तन तय करता है: वृत्ताकार छिद्र के लिए रेले कसौटी न्यूनतम कोण 1.22 लैम्ब्डा बटा D देती है। इनमें से केवल तीसरा ही यहाँ पूछे गए प्रश्न का उत्तर देता है। यही व्यंजक यह भी समझाता है कि रेडियो खगोल विज्ञान को विशाल यंत्र क्यों चाहिए — मीटर तरंगदैर्घ्य पर लैम्ब्डा दृश्य प्रकाश से दस लाख गुना बड़ा होता है, इसलिए D को भी उसी अनुपात में बढ़ाना पड़ता है, और यही कारण है कि पुणे के पास का जायंट मीटरवेव रेडियो टेलीस्कोप 45 मीटर के तीस तश्तरीनुमा एंटेना कई किलोमीटर में फैलाकर उन्हें इस तरह जोड़ता है कि पूरा समूह एक बहुत बड़े द्वारक की तरह व्यवहार करे।
प्रश्न में लिखी संज्ञा पढ़िए, फिर उसे किसी सूत्र में ढूँढ़िए। 'विभेदन क्षमता' सीधे थीटा बराबर 1.22 लैम्ब्डा बटा D की ओर ले जाती है, और यह सूत्र सामने आते ही उत्तर यांत्रिक रूप से निकल आता है: D कोण के हर में है, इसलिए बड़ा D छोटा न्यूनतम विभेद्य कोण देगा, अर्थात् अधिक विभेदन क्षमता। विकल्प (c) के विरुद्ध निर्णायक जाँच यह पूछना है कि फोकस दूरी वास्तव में किस सूत्र में आती है — वह आवर्धन के सूत्र में आती है और विवर्तन सीमा में कहीं नहीं, इसलिए यहाँ वही नियन्त्रक चर नहीं हो सकती। एक ईमानदार परिसीमन इस कार्ड पर बनता है, क्योंकि वही सिद्धान्त और वेधशाला की व्यावहारिकता के बीच का अन्तर है: धरती पर लगे दूरदर्शी के लिए वायुमंडल की विक्षुब्धता प्रतिबिम्ब को द्वारक की परवाह किए बिना लगभग एक चाप-सेकंड तक धुँधला कर देती है, इसलिए एक आकार के बाद अतिरिक्त व्यास तीक्ष्णता के बजाय प्रकाश-संग्रहण देता है — जब तक अनुकूली प्रकाशिकी या वायुमंडल से ऊपर का ठिकाना उस सीमा को न हटा दे। इसीलिए हबल का अपेक्षाकृत छोटा 2.4 मीटर दर्पण वर्षों तक तीक्ष्णता में कहीं बड़े ज़मीनी यंत्रों से आगे रहा।
- वृत्ताकार द्वारक के लिए रेले कसौटी: न्यूनतम विभेद्य कोणीय पृथक्करण थीटा = 1.22 λ / D, इसलिए विभेदन क्षमता = D / (1.22 λ) द्वारक के व्यास के साथ बढ़ती है
- λ = 550 नैनोमीटर पर 100 मिलीमीटर का अभिदृश्यक लगभग 1.4 चाप-सेकंड पर विवर्तन-सीमित होता है; हबल अंतरिक्ष दूरदर्शी का 2.4 मीटर दर्पण लगभग 0.05 चाप-सेकंड तक पहुँचता है
- प्रकाश-संग्रहण क्षमता द्वारक के व्यास के वर्ग के अनुपात में होती है, क्योंकि गिनती संग्रहण-क्षेत्रफल की है — D दुगुना करने पर चार गुना प्रकाश मिलता है
- दूरदर्शी की आवर्धन क्षमता अभिदृश्यक की फोकस दूरी बटा नेत्रिका की फोकस दूरी है, और विवर्तन सीमा से उसका कोई सम्बन्ध नहीं; उस सीमा के आगे बढ़ाए गए आवर्धन को रिक्त आवर्धन कहते हैं
- चूँकि विभेदन λ / D पर निर्भर है, रेडियो दूरदर्शी या तो बहुत बड़े होने चाहिए या शृंखला के रूप में जोड़े जाने चाहिए: नारायणगाँव, पुणे के पास का जायंट मीटरवेव रेडियो टेलीस्कोप मीटर तरंगदैर्घ्य पर प्रेक्षण करते 45 मीटर के तीस पूर्णतः घुमाए जा सकने वाले एंटेना का उपयोग करता है
- वायुमंडलीय विक्षुब्धता ज़मीन पर लगे प्रकाशीय दूरदर्शियों को लगभग एक चाप-सेकंड तक सीमित कर देती है, बशर्ते अनुकूली प्रकाशिकी न लगाई जाए — इसीलिए अंतरिक्ष दूरदर्शी अपनी सैद्धान्तिक विभेदन क्षमता अधिक सरलता से प्राप्त कर लेते हैं
दो ईमानदार परिसीमन। ज़मीन पर तीक्ष्णता वायुमंडलीय विक्षुब्धता के कारण लगभग एक चाप-सेकंड पर बँध जाती है, इसलिए एक सीमा के बाद अतिरिक्त व्यास ब्यौरे के बजाय प्रकाश देता है — जब तक अनुकूली प्रकाशिकी या कक्षा उस बन्धन को न हटा दे। और चूँकि विभेदन λ/D पर निर्भर है, मीटर तरंगदैर्घ्य के रेडियो कार्य को विशाल प्रभावी द्वारक चाहिए — GMRT 45 मीटर के तीस एंटेना जोड़कर उन्हें एक की तरह चलाता है।
- 'न्यूनतम विभेद्य कोण घटता है' को 'विभेदन क्षमता घटती है' पढ़ लेना — ये दोनों कथन निष्पादन के बारे में उल्टी बातें कहते हैं
- यह सोचना कि आवर्धन विभेदन सुधारता है; विवर्तन सीमा के आगे अतिरिक्त आवर्धन रिक्त होता है और केवल धब्बे को बड़ा करता है
- यह भूल जाना कि ज़मीनी दूरदर्शी की व्यावहारिक तीक्ष्णता वायुमंडलीय दृश्यता से बँधी है, इसलिए विवर्तन सीमा एक छत है, कोई वचन नहीं
BPSC प्रवृत्ति एक पंक्ति में पूछता है — राशि बढ़ती है, घटती है या वैसी ही रहती है — इसलिए अंक गणना से नहीं, हर निष्पादन-मान को उसके सूत्र से जोड़ रखने से मिलता है। UPSC का सामान्य अध्ययन पत्र अनुप्रयुक्त प्रकाशिकी पसंद करता है: छाया क्यों बनती है, एंडोस्कोप कैसे काम करता है, सीडी पर इन्द्रधनुषी रंग क्यों दिखते हैं — इसलिए वही अध्याय सूत्रों के साथ-साथ परिघटनाओं के लिए भी दोहराना पड़ता है।
इस प्रश्न से सीधे संबंधित कोई पूर्व PYQ उपलब्ध नहीं।
- अभ्यास प्रश्न — वास्तविक PYQ नहीं
खगोलीय दूरदर्शी की आवर्धन क्षमता किससे दी जाती है ?
- (a)अभिदृश्यक का व्यास बटा प्रकाश की तरंगदैर्घ्य
- (b)अभिदृश्यक की फोकस दूरी बटा नेत्रिका की फोकस दूरी
- (c)नेत्रिका की फोकस दूरी बटा अभिदृश्यक की फोकस दूरी
- (d)अभिदृश्यक के व्यास का वर्ग
उत्तर(b) अभिदृश्यक की फोकस दूरी बटा नेत्रिका की फोकस दूरी — यह फोकस दूरियों का अनुपात है, और इसीलिए आवर्धन यंत्र की विभेदन क्षमता के बारे में कुछ नहीं कहता।
- अभ्यास प्रश्न — वास्तविक PYQ नहीं
यदि किसी दूरदर्शी का द्वारक दुगुना कर दिया जाए, तो उसकी प्रकाश-संग्रहण क्षमता हो जाएगी
- (a)आधी
- (b)दुगुनी
- (c)चार गुनी
- (d)अपरिवर्तित
उत्तर(c) चार गुनी — प्रकाश-संग्रहण क्षमता संग्रहण-क्षेत्रफल पर निर्भर है, जो व्यास के वर्ग के अनुपात में होता है।