सांची स्तूप में पाई गई निम्नलिखित मूर्तिकलाओं (Sculptures) में से कौन-सी, प्रत्यक्षतः बौद्ध विचारों से प्रेरित नहीं है ?
- (a)रिक्त सिंहासन (Empty seat)
- (b)शालभंजिका
- (c)वृक्ष
- (d)चक्र
सही — B, शालभंजिका। सांची की शालभंजिका — फूलों से लदे वृक्ष की डाल थामे दिखाई गई स्त्री — उस पुरानी, लोकप्रिय उर्वरता एवं प्रकृति-आत्मा (यक्षी) परंपरा से आती है जो बौद्ध सिद्धांत से पहले की है और उसके बाहर की है। मूर्तिकारों ने इसे मंगलसूचक अभिप्राय के रूप में स्तूप की सज्जा में समाहित कर लिया, किंतु यह किसी बौद्ध विचार का निरूपण नहीं करती। इसके विपरीत रिक्त सिंहासन, वृक्ष और चक्र — तीनों प्रत्यक्ष बौद्ध प्रतीक हैं।
- (a)रिक्त सिंहासन (Empty seat) — रिक्त सिंहासन (या आसन) बुद्ध की उपस्थिति का उत्कृष्ट अमूर्त (अनिकोनिक) प्रतीक है — आरंभिक बौद्ध कला उन्हें मानव रूप में दिखाने से बचती थी, इसलिए खाली आसन स्वयं शास्ता का द्योतक था।
- (c)वृक्ष — वृक्ष बोधगया के उस बोधि वृक्ष का द्योतक है जिसके नीचे बुद्ध को ज्ञान प्राप्त हुआ था — यह केवल सजावट नहीं, बल्कि मूल बौद्ध प्रतीक है।
- (d)चक्र — चक्र धर्मचक्र है, अर्थात 'धर्म का पहिया', जो सारनाथ में बुद्ध के प्रथम उपदेश और उनकी शिक्षा का प्रतीक है — पूर्णतः बौद्ध।
आरंभिक बौद्ध कला (जैसे सांची में, लगभग पहली शताब्दी ईसा पूर्व) मुख्यतः अमूर्त (अनिकोनिक) थी: बुद्ध की प्रतिमा के स्थान पर वह उनके जीवन और शिक्षा को जगाने के लिए प्रतीकों का प्रयोग करती थी — रिक्त सिंहासन, चरण-चिह्न, बोधि वृक्ष, स्तूप और धर्मचक्र। इनके साथ-साथ मूर्तिकारों ने लोक उर्वरता-पंथों से यक्ष, यक्षी और वृक्ष-नारी (शालभंजिका) जैसे लोकप्रिय अभिप्राय भी उधार लिए।
प्रश्न पूछता है कि कौन-सा अभिप्राय बौद्ध सिद्धांत में निहित नहीं है। रिक्त सिंहासन, वृक्ष और चक्र — प्रत्येक बुद्ध के जीवन की किसी विशिष्ट घटना या विचार को संकेतित करता है। शालभंजिका पहले से विद्यमान प्रकृति-आत्मा की छवि है, जिसे उसके मंगलसूचक, उर्वरता से जुड़े भाव के कारण अपनाया गया — इसलिए वही अलग पड़ती है।
- सांची की आरंभिक कला अमूर्त (अनिकोनिक) है, इसलिए बुद्ध को आकृति के रूप में नहीं, प्रतीकों (रिक्त सिंहासन, चरण-चिह्न, बोधि वृक्ष, चक्र, स्तूप) के माध्यम से दिखाया जाता है।
- शालभंजिका (वृक्ष-नारी) लोक यक्ष/यक्षी उर्वरता-पंथों से निकली है, बौद्ध शिक्षा से नहीं।
- रिक्त सिंहासन = बुद्ध की उपस्थिति; बोधि वृक्ष = ज्ञान-प्राप्ति; धर्मचक्र (चक्र) = उनका प्रथम उपदेश।
- सांची (मध्य प्रदेश) का महास्तूप अशोक के काल में आरंभ हुआ; इसके उत्कीर्ण तोरण शुंग-सातवाहन काल के हैं।

- यह मान लेना कि बौद्ध स्तूप पर उत्कीर्ण हर वस्तु बौद्ध प्रतीक है — शालभंजिका जैसे लोक अभिप्राय उधार लिए गए थे।
- चक्र को सजावटी तत्व मान लेना; धर्मचक्र एक मूल बौद्ध प्रतीक है।
'सांची का कौन-सा अभिप्राय बौद्ध प्रतीक है / नहीं है' के रूप में पूछा जाता है, या किसी प्रतीक (चक्र, रिक्त सिंहासन, बोधि वृक्ष) को उसके अर्थ से सुमेलित कराया जाता है।
प्राचीन भारत के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. स्तूप की अवधारणा मूलतः बौद्ध है। 2. स्तूप सामान्यतः अवशेषों का भंडार होता था। 3. बौद्ध परंपरा में स्तूप एक मन्नत-संबंधी और स्मारक संरचना थी। उपर्युक्त में से कितने कथन सही हैं?
- (a) केवल एक
- (b) केवल दो
- (c) तीनों
- (d) कोई नहीं
Answer(b) केवल दो
वही क्षेत्र — बौद्ध स्तूप और उसका प्रतीक-विधान। UPSC स्तूप के उद्भव और कार्य की जाँच करता है (टीले की अवधारणा बौद्ध धर्म से पुरानी है); यह NDA प्रश्न जाँचता है कि सांची का कौन-सा अभिप्राय बौद्ध प्रतीक नहीं है।
- अभ्यास — वास्तविक PYQ नहीं
सांची में बुद्ध के प्रथम उपदेश का प्रतीक है
- (a)कमल
- (b)रिक्त सिंहासन
- (c)चक्र (धर्मचक्र)
- (d)हाथी
Answer(c) चक्र (धर्मचक्र) — 'धर्म का पहिया' सारनाथ के प्रथम उपदेश का द्योतक है।
- अभ्यास — वास्तविक PYQ नहीं
भारतीय मूर्तिकला में शालभंजिका आकृति किससे संबंधित है?
- (a)एक बौद्ध भिक्षु से
- (b)वृक्ष एवं उर्वरता से जुड़ी प्रकृति-आत्मा (यक्षी) से
- (c)एक जैन तीर्थंकर से
- (d)एक राजकीय चित्र से
Answer(b) वृक्ष एवं उर्वरता से जुड़ी प्रकृति-आत्मा (यक्षी) से — फूलों से लदी डाल थामे एक स्त्री।