कभी-कभी समाचारों में आने वाले 'NSE प्राइम' से क्या द्योतित होता है ?
- (a)एक उच्च मानक कॉर्पोरेट अभिशासन पहल
- (b)दीर्घावधि सॉवरेन ग्रीन बाँड
- (c)हाई-टेक स्टार्ट-अप कंपनियों के लिए छूट और करावकाश
- (d)ग़ैर-बैंकिंग वित्तीय संस्थाओं की कतिपय श्रेणियों के लिए ख़ास विशेषाधिकार
सही उत्तर — A, (a) एक उच्च मानक कॉर्पोरेट अभिशासन पहल — 'NSE प्राइम' राष्ट्रीय शेयर बाज़ार का वह स्वैच्छिक ढाँचा है जो सूचीबद्ध कंपनियों के लिए कॉर्पोरेट अभिशासन के ऐसे मानक तय करता है जो प्रचलित विनियमों की अपेक्षा से ऊँचे और अधिक कठोर हैं, और साथ में कुछ अतिरिक्त प्रकटीकरण भी माँगता है ; जो कंपनियाँ इसे अपनाती हैं उनके अनुपालन पर बाज़ार स्वयं निगरानी रखता है । इसका पूरा विचार 'स्वैच्छिक' शब्द पर टिका है — यह किसी नियामक का आदेश नहीं है, बल्कि उन कंपनियों के लिए एक अलग पहचान है जो न्यूनतम विधिक अपेक्षा से आगे जाकर अपने ऊपर कड़े मानक ओढ़ना चाहती हैं । घोषित उद्देश्य चार बताए गए हैं : भारत में कॉर्पोरेट अभिशासन का स्तर ऊँचा उठाना, निवेशकों को ऐसी कंपनियाँ पहचानने का साधन देना, निवेशक-आधार की गुणवत्ता बढ़ाना, और भारतीय पूँजी बाज़ार में विश्वास मज़बूत करना । शुरुआत के समय की समाचार-रिपोर्टों में पात्रता की जो शर्तें बताई गईं उनमें कम से कम चालीस प्रतिशत सार्वजनिक अंशधारिता — जबकि नियामक की सामान्य अपेक्षा पच्चीस प्रतिशत है — और कम से कम आठ निदेशकों वाला मंडल सम्मिलित थे । पृष्ठभूमि के लिए इतना जान लीजिए कि राष्ट्रीय शेयर बाज़ार की स्थापना 1992 में हुई थी और उसने 1994 में कारोबार आरंभ किया ; वह और बंबई शेयर बाज़ार भारत के दो प्रमुख शेयर बाज़ार हैं ।
- (b)दीर्घावधि सॉवरेन ग्रीन बाँड — दीर्घावधि सॉवरेन ग्रीन बॉन्ड एक अलग और वास्तविक विषय है, पर वह सरकार का है, किसी शेयर बाज़ार की पहल नहीं । भारत सरकार ने 2022-23 में पहली बार सॉवरेन ग्रीन बॉन्ड जारी किए, जिनका निर्गम भारतीय रिज़र्व बैंक ने सरकार की ओर से किया, और उनसे जुटाई गई राशि हरित परियोजनाओं पर व्यय के लिए निर्धारित रहती है । यह विकल्प इसलिए आकर्षक लगता है कि दोनों विषय पूँजी बाज़ार से जुड़े हैं और दोनों में 'उच्च मानक' का भाव है । पर ग्रीन बॉन्ड ऋण-प्रतिभूति है और यहाँ पूछी गई पहल अभिशासन का ढाँचा — एक में पैसा जुटता है, दूसरे में आचरण के मानक तय होते हैं ।
- (c)हाई-टेक स्टार्ट-अप कंपनियों के लिए छूट और करावकाश — हाई-टेक स्टार्ट-अप कंपनियों के लिए छूट और करावकाश कर-नीति का विषय है और उसकी व्यवस्था आयकर अधिनियम में है — पात्र स्टार्ट-अप को दस वर्षों में से किन्हीं तीन वर्षों के लाभ पर कर-छूट, जिसके लिए सरकार से मान्यता लेनी पड़ती है । यह न शेयर बाज़ार का काम है, न अभिशासन का । शेयर बाज़ार कर-छूट दे ही नहीं सकता ; वह केवल सूचीयन, कारोबार, निगरानी और प्रकटीकरण से जुड़े नियम बना सकता है । संस्थाओं के अधिकार-क्षेत्र का यह भेद ऐसे प्रश्नों में सबसे तेज़ छँटाई का उपाय है — पहले पूछिए कि यह काम किस संस्था के अधिकार में आता है ।
- (d)ग़ैर-बैंकिंग वित्तीय संस्थाओं की कतिपय श्रेणियों के लिए ख़ास विशेषाधिकार — ग़ैर-बैंकिंग वित्तीय संस्थाओं की श्रेणियों और उन्हें मिलने वाली सुविधाओं का विषय भारतीय रिज़र्व बैंक के अधिकार-क्षेत्र में आता है, जो उनके लिए स्तर-आधारित विनियमन का ढाँचा चलाता है और उसमें ऐसी संस्थाओं को उनके आकार तथा जोखिम के अनुसार अलग-अलग परतों में रखा जाता है । किसी शेयर बाज़ार की पहल का इससे संबंध नहीं । यह विकल्प उन अभ्यर्थियों को खींचता है जो 'प्राइम' शब्द को किसी विशेषाधिकार या वरीयता वाली श्रेणी का सूचक मान लेते हैं । नाम के भाव से विषय तय करना ही यहाँ की भूल है ; पहचान संस्था और अधिकार-क्षेत्र से होती है ।
कॉर्पोरेट अभिशासन का अर्थ है वह व्यवस्था जिससे कंपनी का संचालन और नियंत्रण होता है — निदेशक मंडल की संरचना और स्वतंत्रता, अंकेक्षण समिति, संबंधित पक्ष लेनदेन का प्रकटीकरण, अल्पांश अंशधारकों का संरक्षण और सूचना का समय पर प्रकाशन । भारत में इसका विधिक आधार दो जगह है : कंपनी अधिनियम 2013 और भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड की सूचीयन बाध्यताओं तथा प्रकटीकरण अपेक्षाओं से जुड़ी विनियमावली, जो सूचीबद्ध कंपनियों पर लागू होती है । ये दोनों न्यूनतम अपेक्षाएँ तय करते हैं । स्वैच्छिक ढाँचा इससे आगे की चीज़ है : कोई शेयर बाज़ार अथवा उद्योग-संस्था ऊँचे मानकों का एक समुच्चय बनाती है, कंपनियाँ अपनी इच्छा से उसे अपनाती हैं, और उससे निवेशक को यह पहचानने का साधन मिलता है कि कौन-सी कंपनी न्यूनतम से आगे जाने को तैयार है । इसका तर्क बाज़ार का है, दंड का नहीं — ऊँचे मानक अपनाने वाली कंपनी को बेहतर निवेशक-आधार और अधिक विश्वास मिलने की आशा रहती है ।
यह इस प्रश्नपत्र का अंतिम प्रश्न है और वह उसी 'समाचारों में आया पद पहचानिए' वाली श्रेणी का है जिसमें इससे पहले के दो प्रश्न भी थे । रचना की दृष्टि से यहाँ चारों विकल्प भारतीय वित्तीय जगत के चार अलग-अलग कोनों से उठाए गए हैं — अभिशासन, सरकारी ऋण-प्रतिभूति, कर-नीति और ग़ैर-बैंकिंग वित्तीय संस्थाओं का विनियमन — और तीनों ग़लत विकल्प अपने आप में वास्तविक विषय हैं । इसलिए उत्तर तक पहुँचने का सबसे तेज़ रास्ता अधिकार-क्षेत्र से होकर जाता है : पद का पहला अंश एक शेयर बाज़ार का नाम है, और शेयर बाज़ार कर-छूट नहीं दे सकता, सरकारी बॉन्ड जारी नहीं कर सकता, और ग़ैर-बैंकिंग वित्तीय संस्थाओं का विनियमन नहीं कर सकता ; वह सूचीयन, प्रकटीकरण और अभिशासन के मानकों से जुड़ी पहल अवश्य कर सकता है । इस कार्ड में इस पहल के आरंभ की कोई तारीख़ जान-बूझकर नहीं दी गई है, क्योंकि उपलब्ध स्रोत उस पर एकमत नहीं हैं ; जो बात निश्चित है वह पहल का स्वरूप है, और प्रश्न भी वही पूछता है ।
- 'NSE प्राइम' राष्ट्रीय शेयर बाज़ार का स्वैच्छिक ढाँचा है, जो सूचीबद्ध कंपनियों के लिए प्रचलित विनियमों से ऊँचे और अधिक कठोर कॉर्पोरेट अभिशासन मानक तथा अतिरिक्त प्रकटीकरण निर्धारित करता है ।
- इसे अपनाना अनिवार्य नहीं है ; जो कंपनियाँ स्वेच्छा से इसे अपनाती हैं उनके अनुपालन पर शेयर बाज़ार निरंतर निगरानी रखता है ।
- घोषित उद्देश्य — भारत में कॉर्पोरेट अभिशासन का स्तर ऊँचा उठाना, निवेशकों को ऊँचे मानक अपनाने वाली कंपनियाँ पहचानने का साधन देना, निवेशक-आधार की गुणवत्ता बढ़ाना और पूँजी बाज़ार में विश्वास मज़बूत करना ।
- आरंभ के समय की समाचार-रिपोर्टों के अनुसार पात्रता की शर्तों में कम से कम चालीस प्रतिशत सार्वजनिक अंशधारिता और कम से कम आठ निदेशकों वाला मंडल सम्मिलित थे, जबकि नियामक की सामान्य अपेक्षा पच्चीस प्रतिशत सार्वजनिक अंशधारिता की है ।
- सूचीबद्ध कंपनियों पर लागू अनिवार्य अभिशासन-अपेक्षाएँ कंपनी अधिनियम 2013 तथा भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड की सूचीयन बाध्यताओं एवं प्रकटीकरण अपेक्षाओं वाली विनियमावली से आती हैं ; यह पहल उनसे ऊपर की परत है ।
- राष्ट्रीय शेयर बाज़ार की स्थापना 1992 में हुई और उसने 1994 में कारोबार आरंभ किया ; वह और बंबई शेयर बाज़ार भारत के दो प्रमुख शेयर बाज़ार हैं ।
- नाम के भाव से विषय तय कर लेना । 'प्राइम' शब्द किसी वरीयता या विशेषाधिकार जैसा लगता है, पर यहाँ वह ऊँचे अभिशासन मानकों की पहचान है ।
- अधिकार-क्षेत्र की उपेक्षा करना । शेयर बाज़ार कर-छूट नहीं दे सकता, सरकारी बॉन्ड जारी नहीं कर सकता और ग़ैर-बैंकिंग वित्तीय संस्थाओं का विनियमन नहीं कर सकता ।
- स्वैच्छिक ढाँचे को नियामक की अनिवार्य अपेक्षा समझ लेना । अनिवार्य न्यूनतम अलग है ; यह पहल उससे ऊपर की स्वैच्छिक परत है ।
- तीनों ग़लत विकल्पों को काल्पनिक मान लेना । वे वास्तविक विषय हैं, पर दूसरी संस्थाओं के — और यही उन्हें कठिन बनाता है ।
पूँजी बाज़ार की समसामयिकी पर प्रश्न प्रायः तीन रूपों में आते हैं । पहला — 'यह पद क्या द्योतित करता है' वाला रूप, जैसा यहाँ है ; इसमें चारों विकल्प वास्तविक विषय होते हैं और अंतर केवल यह होता है कि पद किस संस्था और किस क्षेत्र से आता है । दूसरा — संख्या वाला रूप, जिसमें न्यूनतम सार्वजनिक अंशधारिता, स्वतंत्र निदेशकों का अनुपात अथवा किसी सीमा का प्रतिशत पूछा जाता है । तीसरा — संस्थागत रूप, जिसमें नियामक, शेयर बाज़ार, निक्षेपागार और समाशोधन निगम के कार्य आपस में मिलाकर पूछे जाते हैं । उत्तर देने की सबसे भरोसेमंद विधि अधिकार-क्षेत्र से चलना है : पहले तय कीजिए कि पद किस संस्था का है, फिर पूछिए कि वह संस्था कौन-सा काम कर सकती है और कौन-सा नहीं । इससे प्रायः दो-तीन विकल्प एक साथ कट जाते हैं और शेष में से चुनाव आसान हो जाता है ।
इस प्रश्न से सीधे संबंधित कोई पूर्व PYQ उपलब्ध नहीं।
- practice — not a real PYQ
भारत में किसी सूचीबद्ध कंपनी के लिए न्यूनतम सार्वजनिक अंशधारिता की सामान्य अपेक्षा कितनी है ?
- (a)10 प्रतिशत
- (b)25 प्रतिशत
- (c)40 प्रतिशत
- (d)51 प्रतिशत
उत्तर(b) 25 प्रतिशत — यह नियामक की सामान्य अपेक्षा है ; 'NSE प्राइम' जैसे स्वैच्छिक ढाँचों में इससे ऊँची सीमा रखी जाने की बात आरंभ के समय की रिपोर्टों में कही गई थी ।
- practice — not a real PYQ
भारत में सूचीबद्ध कंपनियों पर लागू कॉर्पोरेट अभिशासन संबंधी अपेक्षाएँ मुख्यतः किसमें दी गई हैं ?
- (a)कंपनी अधिनियम, 1956
- (b)सेबी (सूचीयन बाध्यताएँ और प्रकटीकरण अपेक्षाएँ) विनियम, 2015
- (c)भुगतान और निपटान प्रणाली अधिनियम, 2007
- (d)बैंककारी विनियमन अधिनियम, 1949
उत्तर(b) सेबी (सूचीयन बाध्यताएँ और प्रकटीकरण अपेक्षाएँ) विनियम, 2015 — सूचीबद्ध कंपनियों के लिए अभिशासन और प्रकटीकरण की अपेक्षाएँ यहीं दी गई हैं ; कंपनी अधिनियम का वर्तमान रूप 2013 का है, 1956 का नहीं ।