Read the following prose-passage carefully and answer the questions that follow:
"मैं साहित्य को मानव की दृष्टि से देखना बड़ा प्यारा पाता हूँ। जो जाग्रत मानव को स्नेहिल, दयालु और परस्पर-संवेदना से युक्त न करे, जो उसके मनोबल को उद्दीप्त न बना सके, जो उसके स्वर को पर-दुःख-कातर और संवेदन-सम्पन्न न बना सके, उसे साहित्य कहने से मुझे संकोच होता है। मैं अनुभव करता हूँ कि हम लोग एक कठिन समय से सिर झुकाकर गुज़र रहे हैं। आज नाना जातियों के संघर्ष-पूर्ण स्वभावों ने मानव को कष्ट एवं अशान्त बना दिया है। जीव-निरपेक्ष मानव के हित की बात सोचना अरास्थित्तमक हो गया है। ऐसा लग रहा है कि विश्व भर में दुर्बल के प्रति परस्पर स्वार्थ-भरी नृशंसता को स्वीकृति मिल गयी है। इंसान चोटें-साँटें सहकर स्वभाव के आधार पर अन्य जातियों में विश्वास न कर के भी अपनी रक्षा के साथ-साथ दूसरों की रक्षा के लिये प्रयत्नशील रहना चाहता है। उसके रोने-गाने पर असहाय-दृश्य का आरोप किया जाता है, उसके भय और संत्रस्तता का मज़ाक उड़ाया जाता है।"
(a) Write the substance (bhāvartha) of the above passage in your own words.
(b) Discuss the aims and ideas of the author on the basis of the passage.
(c) Evaluate the intellectual trends reflected in the passage.